Home देश इंद‍िरा गांधी की हत्‍या के वक्‍त गायब शख्‍स 40 साल बाद लौटा...

इंद‍िरा गांधी की हत्‍या के वक्‍त गायब शख्‍स 40 साल बाद लौटा घर, पुरुलिया के अनिल की अविश्वसनीय दास्तां

47
0

पुरुलिया के आरशा थाना क्षेत्र में एक ऐसी घटना घटी है जिसने विज्ञान और तर्क को पीछे छोड़ दिया है. 1984 में पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की हत्या के बाद मची अफरा-तफरी में खोया 15 साल का अनिल, आज 55 साल का होकर लौटा है. यह कहानी एक ऐसे वनवास की है, जो राम के वनवास से भी तीन गुना लंबा था.

चमत्कार होते हैं, बस हमें उन पर विश्वास करने के लिए वक्त चाहिए होता है. पश्चिम बंगाल के पुरुलिया जिले में कुछ ऐसा ही चमत्‍कार हुआ है. घने जंगलों और पहाड़ियों से घिरे करांडी गांव में एक ऐसे व्यक्ति की वापसी की चर्चा है, जिसे 40 साल पहले मृत मान लिया गया था. इस शख्स का नाम अनिल कुमार है, जो 15 साल की उम्र में घर से निकले थे और अब 55 साल की उम्र में एक बुजुर्ग के रूप में वापस लौटे हैं. उनके लौटने की घटना ने पूरे इलाके को स्तब्ध कर दिया है.
घटना 1984 की है. यह वह दौर था जब भारत के इतिहास में एक काला अध्याय लिखा जा रहा था. तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की हत्या के बाद पूरा देश सुलग उठा था. जगह-जगह दंगे, आगजनी और अफरा-तफरी का माहौल था. डर हवा में तैर रहा था. उस समय अनिल कुमार की उम्र महज 15 वर्ष थी. गरीबी और परिवार का पेट पालने की जिम्मेदारी उन्हें अपने भाइयों के साथ झारखंड (तब बिहार) के कतरास ले गई थी. वे वहां एक कारखाने में मजदूरी करने गए थे. नन्हें कंधों पर जिम्मेदारी थी, लेकिन किस्मत को कुछ और ही मंजूर था.
मिठाई की दुकान में छिपी एक ‘जिंदगी’
जैसे ही देश में दंगों की आग भड़की, कतरास भी इससे अछूता नहीं रहा. चारों तरफ हाहाकार मच गया. भीड़ सड़कों पर थी और जान बचाना मुश्किल हो गया था. उस भगदड़ में 15 साल का अनिल अपने भाइयों से बिछड़ गया. कल्पना कीजिए उस बच्चे के डर की, जो अपने परिवार से दूर, एक अनजान शहर में मौत को सामने देख रहा था। अपनी जान बचाने के लिए, अनिल एक मिठाई की दुकान में जा छिपा. वह घंटों, शायद दिनों तक वहीं दुबका रहा. बाहर की आवाज़ें उसे डरा रही थीं। उस डर ने उसके बालमन पर ऐसा गहरा असर डाला कि जब मौका मिला, तो वह अपने भाइयों के पास लौटने या घर जाने की हिम्मत नहीं जुटा पाया.डर के साये में अनिल ने कतरास छोड़ दिया और किसी तरह भागकर कोलकाता पहुंच गया.
परिवार का टूटता हुआ सब्र
इधर, अनिल के भाई और परिवार वाले पागलों की तरह उसे ढूंढते रहे. उस जमाने में न मोबाइल था, न सोशल मीडिया. संपर्क का कोई साधन नहीं था. भाइयों ने कतरास की खाक छान मारी, कारखानों में पूछा, अस्पतालों में देखा, लेकिन अनिल का कहीं पता नहीं चला. महीने साल में बदले, और साल दशकों में. परिवार ने भारी मन से यह स्वीकार कर लिया कि दंगों की आग ने उनके घर के चिराग को बुझा दिया है. उन्होंने अनिल को मृत मान लिया और उनकी यादों के साथ जीना सीख लिया. गांव वालों के लिए अनिल एक भूली हुई कहानी बन चुके थे.
40 साल बाद: नियति का यू-टर्न
लेकिन, नियति ने अपनी पटकथा अभी पूरी नहीं लिखी थी. घटना के ठीक 40 साल बाद, पुरुलिया के आरशा में एक चमत्कार हुआ. एक 55 वर्षीय व्यक्ति करांडी गांव की पगडंडियों पर चल रहा था. उसके चेहरे पर झुर्रियां थीं, लेकिन आंखों में अपने घर को पहचानने की चमक थी. जब उसने खुद को अनिल कुमार बताया, तो ग्रामीण सन्न रह गए. पहचान करना मुश्किल था, लेकिन बचपन की यादें, पुराने किस्से और परिवार की जानकारी ने इस असंभव बात को सच साबित कर दिया. जो 15 साल का लड़का गया था, वह अब जीवन की सांझ में लौटा था.
कहां थे अनिल इतने साल?
पता चला कि कोलकाता पहुंचने के बाद अनिल ने जीवन का संघर्ष अकेले ही लड़ा. डर ने उन्हें इतना जकड़ लिया था कि वे कभी वापस संपर्क करने की हिम्मत नहीं कर पाए. लेकिन खून का रिश्ता उन्हें खींच लाया। इतने वर्षों तक गुमनामी के अंधेरे में रहने के बाद, अपने पैतृक गांव की मिट्टी की खुशबू उन्हें वापस ले आई. अनिल कुमार का लौटना किसी फिल्मी कहानी से कम नहीं है.