पटना – ढलती गर्मी की धुंधली होती रोशनी में कभी लालू प्रसाद यादव ने तरक्की का वादा किया था, आज वो खुद के पैदा किए हालात से मुश्किलों और ढलान पर आए समय का सामना कर रहे हैं, ये वो स्थिति है मानो इतिहास खुद को दोहरा रहा हो. बहुत कुछ वैसा ही जैसा साम्राज्यों के ढहने की कहानियां हुआ करती हैं, वैसे ही यादव परिवार की कहानी भी वंशवादी राजनीति की उथल-पुथल से जूझ रहा है – वो जगह जहां ताकत, घमंड और पारिवारिक रिश्ते बहुत ही नाजुक तरीके से आपस में उलझते हैं और जिसका अंत अक्सर बुरे परिणामों में होता है. आज पारिवारिक कलह का साया उनपर मंडरा रहा है, लालू अपनी ही ‘पितृसत्ता के पतन’ की कगार पर खड़े हैं — एक ऐसा दौर जहां सब कुछ ढलान की ओर जाता दिख रहा है.
वंशवाद की राजनीति अक्सर बन जाती है टकराव की जमीन
लालू यादव यह अच्छी तरह जानते हैं कि वंशवाद की राजनीति महानता की राह भी बन सकती है और संघर्ष एवं विवाद को जन्म देने वाली जगह भी. कुख्यात चारा घोटाले के दौरान भ्रष्टाचार के बढ़ते आरोपों के बीच, जब वो खुद मुश्किल में थे, तब अपनी पत्नी राबड़ी देवी को पहली बार मुख्यमंत्री बनाए थे — उनके इस फैसले से एक ऐसी परंपरा शुरू हुई, जिसमें निजी वफादारी और सार्वजनिक जिम्मेदारी का मेल था. राबड़ी देवी के दौर में, लालू प्रसाद के दो साले — सुभाष और साधु यादव — आरजेडी की राजनीति में दखल देने लगे. तब लालू-राबड़ी के नौ बच्चे इतने छोटे थे कि वे सार्वजनिक जीवन में नहीं आ सकते थे. लेकिन आज, दशकों बाद लालू यादव की राजनीतिक विरासत की बुनियाद ही अपनी कमजोरियों और विरोधाभासों के बोझ तले ढहती हुई दिखाई दे रही है.

बहन रोहिणी बनाम छोटे भाई तेजस्वी यादव
पटना में सर्कुलर रोड पर स्थित यादव परिवार के विशाल आवास की उन दीवारों के भीतर विद्रोह की गूंज सुनाई दे रही है, जहां कभी अटूट लगने वाले पारिवारिक रिश्ते बिखरने लगे हैं. उनकी दूसरी बेटी डॉ. रोहिणी आचार्य का हाल ही में घर और पार्टी छोड़ कर चले जाना, और उसके तुरंत बाद तीन बहनों (राजलक्ष्मी, रागिनी और चंदा) का परिवार से दूर जाना, इस राजनीतिक परिवार के भीतर चल रहे उथल-पुथल को साफ बयां करता है. अपने भाई तेजस्वी यादव और उनके सहयोगियों संजय यादव तथा रमीज खान पर आरोप लगा कर भड़की रोहिणी का इस तरह हाई प्रोफाइल तरीके से जाना महज एक पारिवारिक झगड़ा नहीं, बल्कि आरजेडी के उस वर्तमान नेतृत्व की खुलकर की गई कड़ी आलोचना है जिसने पार्टी को उसके सबसे कमजोर चुनावी दौर में पहुंचा दिया है.

बड़े बेटे तेजप्रताप यादव ने मई 2025 में लालू यादव का घर छोड़ दिया था, क्योंकि पूर्व केंद्रीय रेल मंत्री और बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री ने पार्टी और परिवार से उन्हें बर्खास्त कर दिया था. तेजप्रताप बिहार विधानसभा चुनाव 2025 में महुआ से लड़े और हार गए. दो साल पहले, लालू प्रसाद की बड़ी बहू ऐश्वर्या राय (तेज प्रताप यादव की तलाकशुदा पूर्व पत्नी) को यादव परिवार के साथ विवाद के चलते परिवार ने बंगले से बाहर निकाल दिया था. ऐश्वर्या, बिहार के एक राजनेता और लालू प्रसाद के मंत्रिमंडल में पूर्व मंत्री चंद्रिका राय की बेटी और 1970 में 10 महीने के लिए बिहार के मुख्यमंत्री रहे दिवंगत दरोगा प्रसाद राय की पोती हैं.साभार






