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शनिदेव के 5 मंत्रों का करें जाप, चमक उठेगा भाग्य, दूर होगा शनि का कुप्रभाव जानें मंत्र जाप की सही विधि

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ज्योतिष शास्त्र में प्रत्येक ग्रह का अपना अलग महत्व होता है. ये ग्रह मनुष्य के जीवन में सकारात्मक और नकारात्मक दोनों तरह का प्रभाव डालते हैं. इसका असर जातकों के जीवन पर देखने को भी मिलता है. ऐसे में शनिदेव को प्रसन्न करने के लिए कुछ मंत्र हैं, जिनका जाप करना आपके लिए लाभकारी हो सकता है.

शनिदेव को ज्योतिष शास्त्र में क्रूर ग्रह के रूप में देखा जाता है. यदि शनिदेव किसी व्यक्ति से रुष्ट हो जाएं तो उस व्यक्ति को अपने जीवन में अनेक तरह की समस्याओं का सामना करना पड़ सकता है. ऐसा नहीं है कि शनिदेव प्रत्येक व्यक्ति से नाराज रहते हैं. शनि देव कर्म के फल दाता माने जाते हैं, जो व्यक्ति जैसा कर्म करता है उसे उसके अनुरूप शुभ अशुभ परिणाम भोगने ही पड़ते हैं. शनिदेव की पूजा करने के लिए शनिवार का दिन समर्पित किया गया है. इस दिन आप शनिदेव के मंत्रों का जाप कर उन्हें प्रसन्न कर सकते हैं. आइए जानते हैं भोपाल निवासी ज्योतिषी एवं वास्तु सलाहकार पंडित अरविन्द मिश्रा से वे कौनसे मंत्र हैं और उनके जाप की सही विधि.

साथ ही हिंदू धर्म में भगवान शनि की पूजा का बड़ा महत्व है। शनिवार का दिन भगवान शनि को समर्पित है। इस दिन हनुमान जी की भी पूजा होती है। ऐसी मान्यता है कि शनिवार के दिन भगवान शनि की उपासना करने से मनचाहा फल मिलता है। ऐसे में शाम के समय पीपल के सामने सरसों के तेल का दीपक जलाएं।फिर शनि देव के 108 नामों का जाप करें। अंत में आरती करें। ऐसा करने छाया पुत्र की कृपा मिलती है और सोया हुआ भाग्य जागता है।

शनि देव के मंत्र
ओम निलान्जन समाभासं रविपुत्रं यमाग्रजम।
छायामार्तंड संभूतं तं नमामि शनैश्चरम॥
इन मंत्रों का जप
  1. ऊँ त्रयम्बकं यजामहे सुगंधिम पुष्टिवर्धनम ।
  2. उर्वारुक मिव बन्धनान मृत्योर्मुक्षीय मा मृतात ।
  3. ॐ शन्नोदेवीरभिष्टय आपो भवन्तु पीतये।शंयोरभिश्रवन्तु नः। ऊँ शं शनैश्चराय नमः।
  4. ऊँ नीलांजनसमाभासं रविपुत्रं यमाग्रजम्‌।छायामार्तण्डसम्भूतं तं नमामि शनैश्चरम्‌।।
  5. शनि आरोग्य मंत्र
    ध्वजिनी धामिनी चैव कंकाली कलहप्रिहा।
    कंकटी कलही चाउथ तुरंगी महिषी अजा।।
    शनैर्नामानि पत्नीनामेतानि संजपन् पुमान्।
    दुःखानि नाश्येन्नित्यं सौभाग्यमेधते सुखमं।।
  6. भगवान शनि के 108 नाम
    • शनैश्चर :
    • शांत :
    • सर्वाभीष्टप्रदायिन् :
    • शरण्य :
    • वरेण्य :
    • सर्वेश :
    • सौम्य :
    • सुरवन्द्य :
    • सुरलोकविहारिण् :
    • सुखासनोपविष्ट :
    • सुन्दर :
    • घन :
    • घनरूप :
    • घनाभरणधारिण् :
    • घनसारविलेप :
    • खद्योत :
    • मंद :
    • मंदचेष्ट :
    • महनीयगुणात्मन् :
    • मर्त्यपावनपद :
    • महेश :
    • छायापुत्र :
    • शर्व :
    • शततूणीरधारिण् :
    • चरस्थिरस्वभाव :
    • अचञ्चल :
    • नीलवर्ण :
    • नित्य :
    • नीलाञ्जननिभ :
    • नीलाम्बरविभूषण :
    • निश्चल :
    • वैद्य :
    • विधिरूप :
    • विरोधाधारभूमि :
    • भेदास्पद स्वभाव :
    • वज्रदेह :
    • वैराग्यद :
    • वीर :
    • वीतरोगभय :
    • विपत्परम्परेश :
    • विश्ववंद्य :
    • गृध्नवाह :
    • गूढ़ :
    • कूर्मांग :
    • कुरूपिण् :
    • कुत्सित :
    • गुणाढ्य :
    • गोचर :
    • अविद्यामूलनाश :
    • विद्याविद्यास्वरूपिण् :
    • आयुष्यकारण :
    • आपदुद्धर्त्र :
    • विष्णुभक्त :
    • वशिन् :
    • विविधागमवेदिन् :
    • विधिस्तुत्य :
    • वंद्य :
    • विरुपाक्ष :
    • वरिष्ठ :
    • गरिष्ठ :
    • वज्रांगकुशधर :
    • वरदाभयहस्त :
    • वामन :
    • ज्येष्ठापत्नीसमेत :
    • श्रेष्ठ :
    • मितभाषिण् :
    • कष्टौघनाशकर्त्र :
    • पुष्टिद :
    • स्तुत्य :
    • स्तोत्रगम्य :
    • भक्तिवश्य :
    • भानु :
    • भानुपुत्र :
    • भव्य :
    • पावन :
    • धनुर्मण्डलसंस्था :
    • धनदा :
    • धनुष्मत् :
    • तनुप्रकाशदेह :
    • तामस :
    • अशेषजनवंद्य :
    • विशेषफलदायिन् :
    • वशीकृतजनेश :
    • पशूनांपति :
    • खेचर :
    • घननीलांबर :
    • काठिन्यमानस :
    • आर्यगणस्तुत्य :
    • नीलच्छत्र :
    • नित्य :
    • निर्गुण :
    • गुणात्मन् :
    • निंद्य :
    • वंदनीय :
    • धीर :
    • दिव्यदेह :
    • दीनार्तिहरण :
    • दैन्यनाशकराय :
    • आर्यजनगण्य :
    • क्रूर :
    • क्रूरचेष्ट :
    • कामक्रोधकर :
    • कलत्रपुत्रशत्रुत्वकारण :
    • परिपोषितभक्त :
    • परभीतिहर :
    • भक्तसंघमनोऽभीष्टफलद :
    • निरामय :
    • शनि :