हिंदू धर्म में मृत्यु के अंतिम समय या मृत्यु के बाद व्यक्ति के मुंह में तुलसी का पत्ता और गंगाजल रखने की परंपरा सदियों से चली आ रही है। यह केवल एक धार्मिक रीति नहीं, बल्कि आत्मा की शांति और मोक्ष की प्राप्ति का मार्ग माना जाता है। आइए जानते हैं कि इस परंपरा का…
सनातन धर्म में मृत्यु के अंतिम क्षणों में व्यक्ति के मुंह में गंगाजल और तुलसी का पत्ता रखना एक अत्यंत पवित्र और अनिवार्य परंपरा मानी गई है। इसके पीछे कई गहरे धार्मिक, आध्यात्मिक और व्यावहारिक कारण छिपे हुए हैं। चलिए जानते हैं कि इस बारे में गरुड़ पुराण में क्या कहा गया है?
इसलिए रखी जाती है तुलसी
हिंदू धर्म में तुलसी को सबसे पवित्र और पूजनीय पौधा माना गया है, जो सात्विकता का प्रतीक भी है। तुलसी भगवान विष्णु को अत्यंत प्रिय है, इसीलिए इसे ‘हरिप्रिया’ भी कहा जाता है। यह मान्यता है कि जिसके मुख में मृत्यु के समय तुलसी दल होता है, उसे सीधे भगवान विष्णु के परमधाम यानी वैकुंठ में स्थान मिलता है।
गरुड़ पुराण में भी इस बात का उल्लेख है कि मृत्यु के समय जिस व्यक्ति के सिर, छाती या मुख पर तुलसी का पत्ता होता है, उसके पास यमदूत (यमराज के दूत) नहीं आते, बल्कि विष्णुदूत उस आत्मा को सम्मानपूर्वक लेकर जाते हैं।
मुंह में गंगाजल रखने का महत्व
गंगा नदी को सनातन परंपरा में केवल एक नदी के रूप में नहीं देखा जाता, बल्कि साक्षात ‘मोक्षदायिनी’ (मोक्ष देने वाली) मां माना गया है। ऐसे में मृतक के मुख में गंगाजल डालने से उसके कायिक, वाचिक और मानसिक पाप नष्ट हो जाते हैं। गरुड़ पुराण के अनुसार, यदि मृत्यु के समय किसी के कंठ से गंगाजल नीचे उतरता है, तो उस आत्मा को यमलोक के कष्ट नहीं भोगने पड़ते और वह सीधे मोक्ष (सर्वोच्च गति) को प्राप्त करता है।
इसलिए महत्वपूर्ण है यह विधि
शास्त्रों में माना गया है मृत्यु के समय मुख में तुलसी या गंगाजल डालने का अनुष्ठान जीवात्मा की अगली यात्रा को सुगम, शांतिपूर्ण और पवित्र बनाने के लिए किया जाता है। मृतक के मुख में गंगाजल या तुलसी आदि रखने का मुख्य उद्देश्य व्यक्ति की आत्मा को सांसारिक मोह-माया से मुक्त कर मुक्ति यानी मोक्ष प्रदान करना और शरीर व आत्मा की पवित्रता सुनिश्चित करना है।
हिन्दू धर्म में जीवन को सोलह संस्कारों के माध्यम से परिभाषित किया गया है। जन्म से लेकर मृत्यु तक हर पड़ाव पर ये संस्कार व्यक्ति के जीवन और आत्मा की शुद्धि के लिए महत्वपूर्ण माने जाते हैं। इनमें अंतिम संस्कार, या कहें तो मृत्यु संस्कार, जीवन का सोलहवां और सबसे महत्वपूर्ण संस्कार होता है। (

मृत्यु संस्कार के दौरान कई रीति-रिवाज निभाए जाते हैं, जिनमें से एक प्रमुख है मृतक के मुंह में गंगाजल डालना और तुलसी का पत्ता रखना। यह सिर्फ एक पारंपरिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि इसके पीछे एक गहरा आध्यात्मिक अर्थ छिपा हुआ है। आइए जानते हैं कि इस परंपरा का धार्मिक महत्व क्या है।
गंगाजल से पापों का नाश
गंगाजल को सभी पापों को धोने वाला माना जाता है। धार्मिक मान्यता है कि अंतिम समय में मुंह में गंगाजल डालने से जीवन भर के पाप समाप्त हो जाते हैं। यह जल भगवान विष्णु के चरणों से प्राप्त माना जाता है और इसे मोक्ष का मार्ग खोलने वाला माना जाता है।

तुलसी का विशेष महत्व
तुलसी भगवान विष्णु को प्रिय मानी जाती है। मृत्यु के समय तुलसी का पत्ता मुंह में रखने से आत्मा सीधे वैकुण्ठ पहुंचती है। गरुड़ पुराण में इसका स्पष्ट उल्लेख है। तुलसी का यह प्रयोग आत्मा को शांति देने और उसे नरक या भयंकर यातना से बचाने का काम करता है।

यमदूत से सुरक्षा
मान्यता है कि तुलसी और गंगाजल डालने से यमदूत दूर भागते हैं। ऐसा करने पर आत्मा को नरक में जाने या कष्ट झेलने की आवश्यकता नहीं होती। इसके स्थान पर विष्णु के दूत आते हैं और आत्मा को वैकुण्ठ ले जाते हैं।

प्राणों की शांतिपूर्ण विदाई
जब व्यक्ति अंतिम सांस ले रहा होता है, तभी तुलसी का पत्ता और गंगाजल मुंह में डालना चाहिए। इससे प्राण शांतिपूर्वक निकलते हैं और आत्मा को किसी भी तरह का दर्द या कष्ट नहीं होता।
तुलसी और गंगाजल से विष्णु का स्मरण अपने आप होता है। गीता में श्रीकृष्ण कहते हैं कि जो मेरे नाम का स्मरण कर प्राण त्यागे, वह मेरे पास आता है। इसके अलावा यह परंपरा पितृ दोष से भी रक्षा करती है और आने वाली चौदह पीढ़ियों तक पुण्य की प्राप्ति होती है।

तुलसी-गंगाजल डालते समय मंत्र
धार्मिक ग्रंथों में उल्लेख है कि तुलसी और गंगाजल डालते समय ‘ॐ नमो भगवते वासुदेवाय’ या ‘राधे-राधे’ जैसे मंत्र का उच्चारण करना चाहिए। इससे आत्मा को हरि नाम का बल मिलता है और मोक्ष की संभावना निश्चित हो जाती है।
यह परंपरा आत्मा की शांति, परलोक यात्रा को सफल बनाने और शरीर को अंत समय में सात्विक ऊर्जा प्रदान करने का एक अंतिम आध्यात्मिक प्रयास भी है। ऐसे में यह कहा जा सकता है, कि यह परंपरा इस बात का प्रतीक है कि इंसान ने चाहे जीवन कैसा भी जिया हो, लेकिन उसका अंत पूरी तरह पवित्र, सात्विक और शांतिपूर्ण होना चाहिए ताकि उसकी आत्मा को सद्गति मिल सके।






