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H-1B वीजा पर ट्रंप का बड़ा फैसला – 2 हजार से बढ़कर 1 लाख डॉलर फीस, भारतीय IT पेशेवरों की नौकरी पर आफत

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वाशिंगटन – अमेरिका में नौकरी करने का सपना देख रहे लाखों विदेशी पेशेवरों, खासकर भारतीय IT कर्मचारियों के लिए बड़ी खबर है। राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने H-1B वीजा पर 1 लाख डॉलर शुल्क लगाने से जुड़े आदेश की अवधि एक साल और बढ़ा दी है। व्हाइट हाउस ने शुक्रवार को इसकी जानकारी दी।

मामला अभी अदालत में है, लेकिन इस फैसले ने टेक कंपनियों, विदेशी कर्मचारियों और अमेरिकी इमिग्रेशन नीति को लेकर बहस फिर तेज कर दी है। H-1B वीजा कार्यक्रम का सबसे अधिक उपयोग भारतीय आईटी और तकनीकी पेशेवरों को अमेरिका में नियुक्त करने के लिए किया जाता है।

एक साल और बढ़ी आदेश की अवधि

रॉयटर्स की रिपोर्ट के मुताबिक अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने H-1B गैर-आप्रवासी वीजा पर 1 लाख डॉलर शुल्क लगाने से जुड़े कार्यकारी आदेश की अवधि एक और वर्ष के लिए बढ़ा दी है। यह आदेश पहली बार सितंबर 2025 में जारी किया गया था और इसकी अवधि इस महीने समाप्त होने वाली थी। अब इसे 21 सितंबर 2027 तक बढ़ा दिया गया है।

ट्रंप प्रशासन ने अपने उद्घोषणा में कहा है कि सितंबर 2025 में लगाए गए प्रतिबंध अत्यधिक प्रभावी साबित हुए हैं, लेकिन जिन परिस्थितियों के कारण प्रतिबंध लगाए गए थे, वे अभी भी बनी हुई हैं।

ट्रंप लंबे समय से कर रहे हैं विरोध

राष्ट्रपति ट्रंप लंबे समय से H-1B वीजा कार्यक्रम की आलोचना करते रहे हैं। उनका कहना है कि कुछ कंपनियां अमेरिकी कर्मचारियों की जगह कम वेतन पर विदेशी कर्मचारियों को नियुक्त करने के लिए इस कार्यक्रम का उपयोग करती हैं। इसी वजह से ट्रंप प्रशासन मौजूदा 2,000 से 5,000 डॉलर के शुल्क को स्थायी रूप से बढ़ाकर कम से कम 1 लाख डॉलर करना चाहता है।

व्हाइट हाउस का दावा है कि इस फीस के बाद बड़ी IT स्टाफिंग और आउटसोर्सिंग कंपनियों के H-1B पंजीकरण में 92 प्रतिशत की गिरावट आई है।

अदालतों में जारी है कानूनी लड़ाई

हालांकि इस शुल्क वृद्धि को कानूनी चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है। जून में एक संघीय न्यायाधीश ने ट्रंप प्रशासन द्वारा लगाए गए बढ़े हुए शुल्क को अवैध बताते हुए इसकी वसूली पर रोक लगा दी थी। इस फैसले की समीक्षा बोस्टन स्थित अपीलीय अदालत कर रही है। वहीं एक अन्य अदालत अमेरिकी चैंबर ऑफ कॉमर्स की ओर से दायर चुनौती पर भी विचार कर रही है।

क्या है H-1B वीजा कार्यक्रम

अमेरिकी कांग्रेस द्वारा 1990 में शुरू किया गया यह वीजा कार्यक्रम विशेष रूप से उन प्रौद्योगिकी कंपनियों के लिए महत्वपूर्ण है, जो भारत और चीन से प्रतिभाशाली पेशेवरों की भर्ती करना चाहती हैं। H-1B वीजा के तहत अमेरिकी कंपनियां विदेशी कुशल पेशेवरों को नौकरी पर रख सकती हैं। तकनीकी, इंजीनियरिंग, आईटी, वित्तीय सेवाओं और अन्य विशेषज्ञ क्षेत्रों में काम करने वाले हजारों पेशेवर हर साल इस वीजा के माध्यम से अमेरिका जाते हैं। 75dd

किन लोगों पर लागू नहीं होगा आदेश

यह आदेश उन विदेशी नागरिकों पर लागू नहीं होता जो पहले से छात्र वीजा पर अमेरिका में मौजूद हैं और बाद में H-1B वीजा प्राप्त करते हैं। इसके अलावा मौजूदा H-1B वीजा के नवीनीकरण पर भी यह नियम लागू नहीं किया गया है। इसी कारण नए आवेदकों और पहली बार वीजा प्रायोजन कराने वाली कंपनियों पर इसका प्रभाव अधिक माना जा रहा है। राष्ट्रीय हित से जुड़े मामलों में होमलैंड सिक्योरिटी सचिव छूट भी दे सकते हैं। 75dd

उद्योग जगत ने जताई चिंता, भारत पर असर

अमेरिका के कई उद्योग संगठन और बड़ी कंपनियां इस शुल्क वृद्धि का विरोध करती रही हैं। उनका कहना है कि H-1B वीजा की मदद से उच्च कौशल वाले विशेषज्ञों की भर्ती की जाती है और कई क्षेत्रों में योग्य अमेरिकी कर्मचारियों की कमी को पूरा किया जाता है।

H-1B वीजा का सबसे अधिक लाभ भारतीय आईटी और तकनीकी पेशेवरों को मिलता है। एक्सपर्ट्स का मानना है कि यदि 1 लाख डॉलर शुल्क पूरी तरह लागू होता है तो अमेरिकी कंपनियों की भर्ती लागत बढ़ सकती है। रॉयटर्स के मुताबिक वीजा जांच और प्रक्रिया में बदलाव का असर कंपनियों की भर्ती योजनाओं पर पड़ा है। गूगल की मूल कंपनी अल्फाबेट जैसी बड़ी कंपनियां अब भारत में अपने परिचालन और निवेश को बढ़ाने की दिशा में काम कर रही हैं।