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बांकीपुर विधानसभा उपचुनाव लड्डू तैयार, लेकिन वोटों ने बदल दी कहानी! बांकीपुर में 2015 की याद हुईं ताजा

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पटना – बिहार की राजनीति में कई बार ऐसे मौके आए हैं, जब शुरुआती रुझानों ने राजनीतिक दलों को उत्साहित कर दिया, लेकिन अंतिम नतीजे आने तक तस्वीर पूरी तरह बदल गई. बांकीपुर विधानसभा उपचुनाव की मतगणना के दौरान भी कुछ ऐसा ही दृश्य देखने को मिला. मतगणना शुरू होते ही भाजपा कार्यकर्ता जश्न की तैयारी में जुट गए। पार्टी कार्यालय में कई किलो लड्डू बनवाए जाने लगे, लेकिन जैसे-जैसे मतगणना आगे बढ़ी, तस्वीर बदलती गई और जन सुराज के संस्थापक प्रशांत किशोर लगातार बढ़त बनाते चले गए. यह दृश्य राजनीतिक जानकारों को 2015 के बिहार विधानसभा चुनाव की याद दिला गया, जब अंतिम परिणाम आने से पहले ही भाजपा कार्यालय में पटाखे फोड़े जाने लगे थे, लेकिन शाम तक महागठबंधन ने स्पष्ट बहुमत हासिल कर लिया था.
2015 में जल्दबाजी पड़ी थी भारी
2015 के विधानसभा चुनाव में शुरुआती रुझानों के दौरान भाजपा खेमे में उत्साह का माहौल था. पटना स्थित प्रदेश कार्यालय में कार्यकर्ताओं ने पटाखे छोड़ने शुरू कर दिए थे. कई नेताओं ने जीत का भरोसा भी जताया था. हालांकि जैसे-जैसे मतगणना आगे बढ़ी, महागठबंधन की बढ़त निर्णायक होती गई और अंततः नीतीश कुमार-लालू प्रसाद यादव के गठबंधन ने प्रचंड जीत दर्ज की. भाजपा की शुरुआती खुशी कुछ ही घंटों में मायूसी में बदल गई.मतगणना के दौरान भाजपा कार्यकर्ताओं ने जश्न की तैयारी क्यों शुरू कर दी थी?
बांकीपुर में भी दिखा वैसा ही आत्मविश्वास
करीब 20 राउंड की मतगणना तक प्रशांत किशोर लगातार बढ़त बनाए हुए हैं. वे भाजपा उम्मीदवार नीरज कुमार सिन्हा से लगभग 15 हजार वोटों से आगे चल रहे हैं. इसके बावजूद मतगणना के शुरुआती दौर में भाजपा कार्यकर्ता जश्न की तैयारी करते नजर आए. पार्टी कार्यालय में लड्डू बनवाए गए ताकि जीत की घोषणा होते ही मिठाई बांटी जा सके. हालांकि रुझानों ने धीरे-धीरे अलग कहानी लिखनी शुरू कर दी और भाजपा की उम्मीदों पर सवाल खड़े होने लगे.
क्या दोहराया जा रहा है इतिहास?
2015 और 2026 की इन दोनों तस्वीरों में एक समानता साफ नजर आती है. दोनों ही मौकों पर अंतिम परिणाम आने से पहले उत्सव की तैयारी शुरू हो गई. फर्क सिर्फ इतना है कि 2015 में पटाखे छोड़े जा रहे थे, जबकि इस बार लड्डू तैयार किए जा रहे थे. राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि चुनावी राजनीति में शुरुआती रुझानों के आधार पर जश्न मनाना कई बार जोखिम भरा साबित होता है. मतगणना के दौरान हर राउंड के साथ समीकरण बदल सकते हैं और अंतिम नतीजा आने तक धैर्य बनाए रखना ही बेहतर रणनीति मानी जाती है.
बांकीपुर का संदेश क्या होगा?
बांकीपुर भाजपा का पारंपरिक गढ़ माना जाता रहा है. यदि अंतिम परिणाम भी शुरुआती रुझानों के अनुरूप रहता है और प्रशांत किशोर जीत दर्ज करते हैं, तो यह केवल एक सीट का परिणाम नहीं होगा, बल्कि बिहार की बदलती राजनीति का संकेत भी माना जाएगा. वहीं यदि भाजपा वापसी करती है तो शुरुआती बढ़त और अंतिम परिणाम के बीच के उतार-चढ़ाव की यह कहानी अलग रूप लेगी. फिलहाल मतगणना जारी है और अंतिम परिणाम का इंतजार है. लेकिन, इतना तय है कि बांकीपुर उपचुनाव के नतीजों ने एक बार फिर 2015 की उस तस्वीर को राजनीतिक गलियारों में चर्चा का विषय बना दिया है, जब जीत तय होने से पहले ही जश्न शुरू हो गया था.