शुभेंदु अधिकारी का सियासी सफर, TMC को किया सत्ता से बाहर
पश्चिम बंगाल की राजनीति में अगर किसी एक चेहरे ने बीजेपी को हाशिए से उठाकर सत्ता के दरवाजे तक पहुंचाया है, तो वह नाम है शुभेंदु अधिकारी। कभी ममता बनर्जी के सबसे भरोसेमंद सहयोगी रहे सुवेंदु आज बंगाल में बीजेपी की सबसे बड़ी ताकत बन चुके हैं। 2026 के विधानसभा चुनाव में बीजेपी की ऐतिहासिक जीत के पीछे जिस रणनीतिकार की सबसे ज्यादा चर्चा हो रही है, वह शुभेंदु अधिकारी ही हैं। बंगाल की राजनीति को करीब से समझने वाले जानकार मानते हैं कि ममता सरकार की कमजोरियों को पहचानने और जमीनी स्तर पर बीजेपी का नेटवर्क मजबूत करने में शुभेंदु की भूमिका निर्णायक रही।
पूर्वी मेदिनीपुर के कांथी में 15 दिसंबर 1970 को जन्मे सुवेंदु अधिकारी एक मजबूत राजनीतिक परिवार से आते हैं। उनके पिता शिशिर अधिकारी बंगाल की राजनीति के प्रभावशाली नेताओं में गिने जाते रहे हैं। मेदिनीपुर क्षेत्र में अधिकारी परिवार का दशकों से मजबूत जनाधार रहा है। राजनीति की शुरुआती समझ सुवेंदु को परिवार से ही मिली।
उन्होंने 1989 में कांग्रेस की छात्र इकाई छात्र परिषद से अपने राजनीतिक जीवन की शुरुआत की। उस दौर में पश्चिम बंगाल में वामपंथी राजनीति का दबदबा था और विपक्षी छात्र राजनीति करना आसान नहीं माना जाता था। लेकिन सुवेंदु ने शुरुआती दौर से ही संघर्ष की राजनीति को चुना। 1995 में कांथी नगर पालिका के पार्षद बनने के साथ उन्होंने सक्रिय चुनावी राजनीति में कदम रखा।
1998 में जब ममता बनर्जी ने तृणमूल कांग्रेस की स्थापना की, तब अधिकारी परिवार भी उनके साथ खड़ा हो गया। धीरे-धीरे सुवेंदु ममता बनर्जी के सबसे भरोसेमंद नेताओं में शामिल हो गए। लेकिन उनके राजनीतिक जीवन का सबसे बड़ा मोड़ 2007 का नंदीग्राम आंदोलन बना।
वाम मोर्चा सरकार द्वारा किसानों की जमीन अधिग्रहण के फैसले के खिलाफ जब नंदीग्राम में आंदोलन शुरू हुआ, तब सुवेंदु अधिकारी ने “भूमि उच्छेद प्रतिरोध कमेटी” का गठन किया। उस समय ममता बनर्जी कोलकाता और दिल्ली में आंदोलन की आवाज बुलंद कर रही थीं, लेकिन गांव-गांव जाकर लोगों को संगठित करने का काम सुवेंदु कर रहे थे। वे किसानों के बीच रहते, स्थानीय भाषा में संवाद करते और आंदोलन को जमीनी ताकत देते रहे।
14 मार्च 2007 की पुलिस फायरिंग के बाद नंदीग्राम आंदोलन पूरे देश में चर्चा का विषय बन गया। इस दौरान सुवेंदु ने न सिर्फ आंदोलन को संभाला, बल्कि घायलों और पीड़ित परिवारों के साथ भी खड़े रहे। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि नंदीग्राम आंदोलन ने ही 2011 में 34 साल पुरानी वाम सरकार को सत्ता से बाहर करने की नींव रखी थी।
हालांकि समय के साथ ममता बनर्जी और सुवेंदु अधिकारी के रिश्तों में दूरी बढ़ने लगी। 2020 आते-आते यह दूरी खुलकर सामने आ गई और आखिरकार सुवेंदु ने टीएमसी छोड़कर बीजेपी का दामन थाम लिया। 2021 का विधानसभा चुनाव बंगाल की राजनीति का सबसे बड़ा मुकाबला बना, जब ममता बनर्जी ने अपनी पारंपरिक भवानीपुर सीट छोड़कर नंदीग्राम से सुवेंदु के खिलाफ चुनाव लड़ने का फैसला किया।
लेकिन नंदीग्राम में शुभेंदु अधिकारी ने ममता बनर्जी को हराकर बंगाल की राजनीति में खुद को सबसे बड़े विपक्षी चेहरे के तौर पर स्थापित कर दिया। इसके बाद वे विधानसभा में विपक्ष के नेता बने और बीजेपी के बंगाल अभियान की कमान संभाली।
2026 के चुनाव में सुवेंदु अधिकारी ने संदेशखाली, आरजी कर मेडिकल कॉलेज मामले और हावड़ा-उलबेरिया हिंसा जैसे मुद्दों को आक्रामक तरीके से उठाया। उन्होंने पूरे बंगाल में लगातार यात्राएं कीं और टीएमसी की चुनावी रणनीति को उसी की भाषा में जवाब दिया। बीजेपी को 3 सीटों से आगे बढ़ाकर दो-तिहाई बहुमत की स्थिति तक पहुंचाने में उनकी भूमिका को निर्णायक माना जा रहा है।
व्यक्तिगत जीवन की बात करें तो सुवेंदु अधिकारी अविवाहित हैं और उत्कल ब्राह्मण समुदाय से आते हैं। उनके खिलाफ कई मुकदमे भी दर्ज हैं, लेकिन वे इन्हें राजनीतिक प्रतिशोध बताते रहे हैं।
अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि बंगाल में बीजेपी की सरकार बनने की स्थिति में शुभेंदु अधिकारी को नई जिम्मेदारी मिल चुकी है। नंदीग्राम का यह नेता अब मुख्यमंत्री की कुर्सी तक पहुंच चुका है? कल शुभेंदु बंगाल के CM के तौर पर शपथ लेंगे। उनका यह सफर बेहद रोमांचक रहा है।






