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मोहन भागवत की सुरक्षा पर कितना ख़र्च करती है सरकार, गृह मंत्रालय ने जानकारी देने से किया इनकार

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एक आरटीआई आवेदन के तहत राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) प्रमुख मोहन भागवत की सुरक्षा पर होने वाले ख़र्च की जानकारी मांगने पर गृह मंत्रालय और सीआईएसएफ ने सूचना देने से इनकार कर दिया है. मंत्रालय ने सुरक्षा और निजता का हवाला दिया, जबकि सीआईएसएफ ने ख़ुद को क़ानून से छूट प्राप्त संस्था बताते हुए जानकारी देने से मना कर दिया.

नई दिल्ली – राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के प्रमुख मोहन भागवत की सुरक्षा पर केंद्र सरकार कितना खर्च करती है, यह जानने के लिए दायर आरटीआई आवेदनों के जवाब में गृह मंत्रालय और केंद्रीय औद्योगिक सुरक्षा बल (सीआईएसएफ) ने जानकारी देने से मना कर दिया है.

जहां मंत्रालय ने सुरक्षा और निजता से जुड़ी धाराओं का हवाला दिया, वहीं सीआईएसएफ ने खुद को आरटीआई कानून से छूट प्राप्त संस्था बताते हुए जानकारी देने से इनकार किया.

ध्यान रहे, मोहन भागवत कोई संवैधानिक पदाधिकारी नहीं हैं. वे एक गैर-सरकारी संगठन आरएसएस के सरसंघचालक हैं, लेकिन उन्हें केंद्र सरकार की ओर से उच्चस्तरीय सुरक्षा प्राप्त है. ऐसे में यह सवाल स्वाभाविक है कि उनकी सुरक्षा पर कितना खर्च होता है.

यह मामला केवल एक व्यक्ति की सुरक्षा व्यवस्था का नहीं, बल्कि उस पारदर्शिता का भी है जो सार्वजनिक धन और राज्य संसाधनों के उपयोग से जुड़ी होती है.

आरटीआई में क्या पूछा गया था?

16 अप्रैल, 2026 को संवाददाता ने गृह मंत्रालय को आरटीआई आवेदन भेजकर सात बिंदुओं पर जानकारी मांगी थी. इसमें मोहन भागवत की सुरक्षा पर अब तक हुए कुल खर्च, 2015 से अब तक सालाना खर्च, सीआईएसएफ, राज्य पुलिस और अन्य एजेंसियों पर होने वाला व्यय, वाहनों, संचार प्रणाली, हथियारों, यात्रा और अन्य व्यवस्थाओं पर खर्च, सुरक्षा बढ़ाए जाने के बाद अतिरिक्त खर्च, आदि की जानकारी मांगी गई थी.

इसी विषय पर सीआईएसएफ को अलग आवेदन में यह भी पूछा गया कि मोहन भागवत की सुरक्षा के लिए सीआईएसएफ कब से तैनात है, कितने कर्मी लगाए गए हैं, रैंकवार संख्या क्या है, कोई विशेष सुरक्षा इकाई नियुक्त है या नहीं, और सीआईएसएफ वर्तमान में कितने वीवीआईपी/वीआईपी को सुरक्षा दे रही है.

गृह मंत्रालय से क्या जवाब मिला?

गृह मंत्रालय के वीआईपी सिक्योरिटी यूनिट ने 7 मई, 2026 में भेजे उत्तर में कहा कि आवेदन में मांगी गई जानकारी सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 की धारा 8(1)(g) और 8(1)(j) के तहत अपवर्जित (एक्ज़ेम्प्टेड) है, इसलिए उपलब्ध नहीं कराई जा सकती.

यानी मंत्रालय ने न तो खर्च का कोई आंकड़ा दिया, न सुरक्षा स्तर पर कोई स्पष्ट जानकारी दी, न एसओपी साझा किए.

इन धाराओं का मतलब क्या है?

धारा 8(1)(g) कहती है कि ऐसी सूचना रोकी जा सकती है जिससे किसी व्यक्ति की जान या सुरक्षा को खतरा हो, या कानून लागू कराने वाले स्रोतों की पहचान उजागर हो सकती हो.

धारा 8(1)(j) निजी सूचना से संबंधित है. इसके तहत ऐसी व्यक्तिगत जानकारी देने से इनकार किया जा सकता है जिसका किसी सार्वजनिक गतिविधि या जनहित से सीधा संबंध न हो, या जिससे किसी व्यक्ति की निजता का अनावश्यक अतिक्रमण हो.

गृह मंत्रालय ने इन दोनों धाराओं का इस्तेमाल कर यह संकेत दिया कि सुरक्षा पर खर्च, संसाधन और व्यवस्था का खुलासा सुरक्षा जोखिम या निजता का प्रश्न बन सकता है.

हालांकि, आरटीआई कार्यकर्ताओं का तर्क रहा है कि कुल सार्वजनिक खर्च बताना और सुरक्षा की सामरिक बारीकियां बताना दो अलग बातें हैं. उदाहरण के लिए, किसी व्यक्ति की सुरक्षा पर कुल वार्षिक व्यय बताना जरूरी नहीं कि ऑपरेशनल विवरण उजागर करे.

सीआईएसएफ ने क्या कहा?