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राघव चड्ढा घायल थे, इसलिए घातक साबित हुए.. 22 दिन में कैसे 6 और सांसद भी AAP से तोड़ डाले, समझें उलटफेर की पटकथा से

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नई दिल्‍ली – आम आदमी पार्टी के भीतर 2 अप्रैल 2026 से शुरू हुआ सियासी तूफान 22 दिनों के भीतर बड़े राजनीतिक संकट में बदल गया है. राज्यसभा में पार्टी के डिप्टी लीडर रहे राघव चड्ढा के साथ-साथ 7 सांसदों ने पार्टी छोड़ दी है. राघव के साथ संदीप पाठक और अशोक मित्तल ने प्रेस कॉन्‍फ्रेंस करते हुए इस ऐलान किया. ये तीनों पंजाब से सांसद हैं. इसके लिए जरूरी कागजी कार्रवाई राज्‍यसभा में शुक्रवार शुरू ही पूरी कर ली गई. अब अहम बात यह है कि 2 अप्रैल को राघव को पद से हटाए जाने के बाद ही ये कयास लगने लग गए थे कि कुछ तो बड़ा होने वाला है.. इसका इशारा खुद उन्‍होंने ही दिया था. ध्‍यान दीजिएगा… राघव ने कहा था कि हर झूठ का पर्दाफाश होगा… क्योंकि मैं घायल हूं, इसलिए घातक हूं. उन्होंने पार्टी को खुली चुनौती देते हुए कहा था ‘मेरी खामोशी को मेरी हार मत समझ लेना.’
चलिए समझते हैं इस पूरी पटकथा की संभावित कहानी..
दरअसल, आम आदमी पार्टी ने आधिकारिक तौर पर राघव पर दो अप्रैल को की गई कार्रवाई का कारण तो स्पष्ट तो नहीं किया था, लेकिन अंदरूनी तौर पर यह कहा गया कि चड्ढा पार्टी की गतिविधियों से दूरी बना रहे थे और कई अहम मुद्दों पर उनकी चुप्पी सवालों में थी. यहां तक कि राज्यसभा सचिवालय को लिखे पत्र में उनके बोलने के अधिकार तक सीमित करने की बात सामने आई, जिसने अंदरूनी खींचतान को और हवा दे दी.
कार्रवाई के अगले ही दिन 3 अप्रैल को राघव चड्ढा ने सोशल मीडिया के जरिए तीखा जवाब दिया. उन्होंने आरोपों को सुनियोजित अभियान और सरासर झूठ करार दिया. चड्ढा ने कहा कि मैंने हमेशा संसद में जनता से जुड़े मुद्दों को उठाया है. मैं वहां सरकार पर दबाव डालने के लिए हूं, हंगामा करने के लिए नहीं. फिल्मी अंदाज में उन्होंने कहा था, हर झूठ का पर्दाफाश होगा… क्योंकि मैं घायल हूं इसलिए घातक हूं. मेरी खामोशी को मेरी हार मत समझ लेना.
सदन से वॉकआउट न करने के आरोप पर चड्ढा ने कहा कि यह पूरी तरह झूठ है और पार्टी से एक भी उदाहरण पेश करने को कहा. उन्होंने कहा कि संसद में हर जगह CCTV है, फुटेज दिखा दीजिए, सब साफ हो जाएगा. उन्होंने यह भी साफ किया कि वे संसद में हंगामा, माइक तोड़ने या अपशब्द कहने नहीं बल्कि GST, आयकर, वायु प्रदूषण, जल संकट, स्वास्थ्य, शिक्षा, बेरोजगारी और महंगाई जैसे मुद्दे उठाने के लिए जाते हैं.
22 दिन में बड़ा सियासी खेल और 7 सांसद अलग
इस टकराव के बाद घटनाक्रम तेजी से बदला. 22 दिनों के भीतर राघव चड्ढा ने बड़ा दांव खेलते हुए पार्टी में टूट की रणनीति अपनाई. ऐसा कहा जा रहा है कि राघव ने ही इसकी पूरी स्‍क्रीप्‍ट लिखी और स्‍वाति मालीवाल ने भी उनका साथ दिया. क्‍योंकि दोनों ही आम आदमी पार्टी से घायल थे, इसलिए घातक थे. राघव ने शुक्रवार को इस अहम प्रेस कॉन्फ्रेंस को लीड करते हुए ऐलान किया कि वे AAP छोड़ रहे हैं और उनके साथ कई राज्यसभा सांसद भी अलग हो रहे हैं. चड्ढा ने दावा किया कि राज्यसभा में पार्टी के 10 सांसद हैं और दो-तिहाई से ज्यादा हमारे साथ हैं… हमने इस संबंध में दस्तावेज राज्यसभा में जमा कर दिए हैं. इसके साथ ही उन्‍होंने कहा कि ये तीनों यानि चड्ढा, संदीप पाठक और अशोक मित्तल भाजपा में विलय कर रहे हैं यानि उसमें शामिल हो रहे हैं. वहीं, बाकी के सांसद भी बीजेपी में आ रहे हैं.
इसमें प्रमुख नाम शामिल हैं
  • राघव चड्ढा (पंजाब)
  • संदीप पाठक (पंजाब)
  • अशोक मित्तल (पंजाब)
  • हरभजन सिंह (पंजाब)
  • एनडी गुप्ता (दिल्ली)
  • विक्रमजीत सिंह साहनी (पंजाब)
  • स्वाति मालीवाल (दिल्ली)
क्या स्वाति मालीवाल की हो सकती है संभावित भूमिका?
आम आदमी पार्टी (AAP) के भीतर मचे इस राजनीतिक घमासान ने भारतीय राजनीति में एक बड़ा भूचाल ला दिया है. राज्यसभा में राघव चड्ढा के नेतृत्व में 7 सांसदों का पार्टी छोड़कर भाजपा में शामिल होने का फैसला न केवल ‘आप’ के लिए एक अस्तित्व का संकट है, बल्कि इसमें स्वाति मालीवाल की भूमिका और उनकी अरविंद केजरीवाल से ‘अदावत’ एक बड़ा प्‍वॉइंट भी हो सकती है. राजनीतिक पंडितों का माना है कि स्वाति मालीवाल इस विद्रोह में शामिल हो सकती हैं, क्‍योंकि राघव से पहले पार्टी ने उन पर कार्रवाई की थी और खूब बवाल मचा था. मालीवाल पिछले काफी समय से पार्टी नेतृत्व खासकर केजरीवाल के उनके करीबी सहयोगियों के खिलाफ मुखर रही हैं. बिभव कुमार मामले के बाद से ही वह पार्टी में अलग-थलग पड़ गई थीं. माना जा रहा है कि उन्होंने अन्य असंतुष्ट सांसदों जैसे राघव चड्ढा वगैरह के लिए एक असहमति का आधार तैयार किया हो? मालीवाल ने भ्रष्टाचार और सिद्धांतों से भटकाव के मुद्दों को जोर-शोर से उठाया था.
AAP पर संकट, BJP को फायदा?
अब इस घटनाक्रम ने AAP के लिए राज्यसभा और खासकर पंजाब में राजनीतिक समीकरण बदल दिए हैं. पार्टी के भीतर यह सबसे बड़ा विभाजन माना जा रहा है, जिससे संगठनात्मक मजबूती पर सवाल खड़े हो गए हैं. अगला सवाल ये है कि पंजाब चुनाव पर क्‍या इसका कोई असर होगा. पंजाब विधानसभा चुनाव आमतौर पर 2027 में होने हैं. ऐसे में AAP के भीतर यह टूट सीधा चुनावी असर डाल सकती है. पंजाब में पार्टी की पकड़ कमजोर हो सकती है. BJP और अन्य दलों को राजनीतिक स्पेस बढ़ाने का मौका मिल सकता है. खासतौर पर अगर बड़े चेहरे और सांसद पार्टी छोड़ते हैं, तो कैडर और वोट बैंक में भ्रम की स्थिति बन सकती है. राज्यसभा में संख्या संतुलन और विपक्ष की रणनीति पर भी इसका असर पड़ेगा. आने वाले समय में यह तय करेगा कि AAP इस संकट से उबरती है या विपक्षी दल इसका राजनीतिक लाभ उठाते हैं?
2 अप्रैल की कार्रवाई से शुरू हुआ विवाद 22 दिनों में AAP के लिए बड़े राजनीतिक संकट में बदल गया. राघव चड्ढा का आक्रामक रुख और ‘घायल हूं इसलिए घातक हूं. मेरी चुप्‍पी को मेरी खमोशी मत समझ लेना’ जैसे बयान इस पूरे घटनाक्रम को और सस्‍पेंस से भरा बना दिया था. अब नजरें इस पर हैं कि 2027 के पंजाब चुनाव में यह सियासी भूचाल किसके पक्ष में जाता है?