ईरान के खिलाफ अमेरिका के ‘ऑपरेशन एपिक फ्यूरी’ ने अब सबसे खतरनाक मोड़ ले लिया है. पेंटागन ने ईरान की कोस्टलाइन और स्ट्रैटेजिक आइलैंड्स पर जमीनी सेना उतारने का पूरा प्लान तैयार कर लिया है. जहां एक तरफ अमेरिकी डिफेंस सेक्रेटरी ने ईरान की नेवी और एयर डिफेंस को तबाह करने का दावा किया है, वहीं एक्सपर्ट्स का मानना है कि ईरान के पहाड़ों में छिपी सेना और सुसाइड ड्रोन्स ट्रंप की सेना के लिए ‘मौत का जाल’ बन सकते हैं.
वाशिंगटन – वेस्ट एशिया में चल रहा युद्ध अब उस दहलीज पर पहुंच गया है जहां से वापसी का कोई रास्ता नहीं दिखता. अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के ‘अमेरिका फर्स्ट’ एजेंडे के तहत शुरू हुआ ‘ऑपरेशन एपिक फ्यूरी’ अब अपने तीसरे हफ्ते में प्रवेश कर चुका है. पेंटागन की हालिया हलचल और डिफेंस सेक्रेटरी पीट हेगसेथ के बयानों ने यह साफ कर दिया है कि अमेरिका अब ईरान की सीमाओं के भीतर अपने ‘बूट्स ऑन द ग्राउंड’ यानी पैदल सेना उतारने की गंभीर योजना बना रहा है. डिफेंस सेक्रेटरी हेगसेथ ने गर्व से घोषणा की है कि अमेरिकी सेना ने अब तक ईरान के 7,000 से अधिक सैन्य ठिकानों को ध्वस्त कर दिया है. उनके मुताबिक, यह कोई मामूली हमला नहीं बल्कि एक ‘ओवरव्हेल्मिंग फोर्स’ का सटीक इस्तेमाल है.
अमेरिका का दावा है कि उसने ईरान की वायु रक्षा प्रणाली को पूरी तरह से ‘फ्लैटन’ यानी समतल कर दिया है. ईरान की मिसाइल बनाने वाली फैक्ट्रियां और ड्रोन प्रोडक्शन लाइन्स अब मलबे के ढेर में तब्दील हो चुकी हैं. लेकिन असली हलचल पेंटागन के उन कमरों में है, जहां ईरान की सरजमीं पर उतरने का ब्लूप्रिंट तैयार किया जा रहा है.
खार्ग आइलैंड पर कब्जे की तैयारी
- रॉयटर्स की रिपोर्ट के मुताबिक, व्हाइट हाउस और पेंटागन के बीच इस समय सबसे बड़ी चर्चा ‘खार्ग आइलैंड‘ को लेकर है. यह वह रणनीतिक द्वीप है जहां से ईरान का 90 प्रतिशत तेल निर्यात होता है.
- अमेरिका ने इस महीने की शुरुआत में यहां के सैन्य ठिकानों पर भारी बमबारी की थी, लेकिन अब रणनीति बदल रही है. एक्सपर्ट्स का मानना है कि इस द्वीप को पूरी तरह नष्ट करने के बजाय उस पर कब्जा करना अमेरिका के लिए ज्यादा फायदेमंद होगा.
- अगर अमेरिकी सेना खार्ग आइलैंड पर नियंत्रण पा लेती है, तो वह ईरान की पूरी इकोनॉमी को अपने हाथ में ले लेगी. इसके लिए मरीन कॉर्प्स और स्पेशल फोर्सेज के इस्तेमाल की बात की जा रही है. हालांकि, यह मिशन किसी सुसाइड मिशन से कम नहीं है.
- एक अमेरिकी अधिकारी ने नाम न छापने की शर्त पर डेली मेल को बताया कि ईरान के पास अब भी ऐसे ड्रोन्स और मिसाइलें मौजूद हैं जो खार्ग आइलैंड को एक जलते हुए मलबे में बदल सकते हैं. क्या ट्रंप प्रशासन इस जोखिम को उठाने के लिए तैयार है?
ईरान के परमाणु ठिकानों पर सर्जिकल स्ट्राइक का प्लान
अमेरिका का सबसे बड़ा डर ईरान का परमाणु कार्यक्रम है. अधिकारियों के बीच इस बात पर गंभीर मंथन हुआ है कि क्या अमेरिकी स्पेशल ऑपरेशंस यूनिट्स का इस्तेमाल ईरान के ‘हाइली एनरिच्ड यूरेनियम’ के भंडारों को अपने कब्जे में लेने के लिए किया जा सकता है.
यह एक बेहद जटिल और खतरनाक मिशन होगा, जिसे केवल नेवी सील्स या डेल्टा फोर्स जैसी एलीट टीमें ही अंजाम दे सकती हैं.
नतांज, फोर्डो और इस्फहान जैसे परमाणु केंद्र ईरान के सबसे सुरक्षित इलाकों में से एक हैं. इन ठिकानों को पहाड़ों के अंदर और कंक्रीट की कई परतों के नीचे बनाया गया है.
जनरल डैन केन के मुताबिक, अमेरिका अब 5,000 पाउंड के ‘पेनेट्रेटर वेपन्स’ का इस्तेमाल कर रहा है, जो चट्टानों और कंक्रीट को चीरकर अंदर धमाका करते हैं. लेकिन परमाणु सामग्री को सुरक्षित निकालना एक अलग ही चुनौती है. इसके लिए जमीनी सेना का वहां पहुंचना अनिवार्य हो जाएगा, जो इस युद्ध को सीधे तौर पर ईरान के दिल तक ले जाएगा.
क्या ट्रंप की सेना ईरान के ‘डेथ ट्रैप’ में फंस जाएगी?
- भले ही अमेरिका अपनी हवाई ताकत का लोहा मनवा रहा हो, लेकिन जमीन पर हकीकत कुछ और हो सकती है. मिलिट्री एनालिस्ट पैट्रिशिया मारिंस का कहना है कि ईरान कोई इराक या अफगानिस्तान नहीं है.
- ईरान का भूगोल और उसकी सैन्य संरचना बेहद जटिल है. ईरान के पास 6 लाख की एक्टिव आर्मी है, जिसमें 1 लाख 90 हजार बेहद प्रशिक्षित और कट्टर ‘ईरानी रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स’ (IRGC) के जवान शामिल हैं.
- ईरान ने पिछले कुछ वर्षों में ड्रोन टेक्नोलॉजी में महारत हासिल की है. ‘शाहेद’ जैसे ड्रोन्स ने यूक्रेन युद्ध में अपनी मारक क्षमता साबित की है. अमेरिका के पास फिलहाल इन सस्ते लेकिन घातक ड्रोन्स का कोई पुख्ता एंटी-डोज नहीं है.
- अगर अमेरिकी जहाज स्ट्रेट ऑफ होर्मुज (Strait of Hormuz) के पास सेना उतारने की कोशिश करते हैं, तो उन्हें ड्रोन के झुंड, समुद्री माइन्स और सुसाइड बोट्स का सामना करना पड़ेगा. जानकारों का कहना है कि यह हमला दूसरे विश्व युद्ध की ‘नॉर्मंडी लैंडिंग’ जैसा खूनी साबित हो सकता है.
5000 अमेरिकी सैनिक vs ईरान का अभेद्य भूगोल
ईरान का क्षेत्रफल इराक से चार गुना बड़ा है. इसकी लंबी कोस्टलाइन और विशाल ऊंचे पहाड़ इसे एक प्राकृतिक किला बनाते हैं. जनरल मैल्कम नैंस जैसे विशेषज्ञों का मानना है कि केवल 2,500 या 5,000 सैनिकों के साथ ईरान में घुसना एक बड़ी भूल हो सकती है.
40 साल पहले के युद्ध अभ्यास बताते हैं कि स्ट्रेट ऑफ होर्मुज के द्वीपों – लारक, होर्मुज और केशम – पर कब्जा करने के लिए ही कम से कम 6,000 मरीन्स की जरूरत होगी.
ईरान की सेना पहाड़ों में बने बंकरों में तैनात है, जहां से वे अमेरिकी ठिकानों पर लगातार गोलाबारी कर सकते हैं. इसके अलावा, कतर और यूएई जैसे अमेरिकी सहयोगियों पर भी ईरानी मिसाइलों का खतरा मंडरा रहा है.
अगर अमेरिका इन देशों के बेस का उपयोग करता है, तो ईरान उन पर भी हमला करेगा. यह पूरे मिडिल ईस्ट को एक ऐसी आग में झोंक देगा जिसे बुझाना नामुमकिन होगा.

इस सैटेलाइट तस्वीर में कथित हवाई हमलों के बाद हकीमाबाद गैरीसन में हुई क्षति दिखाई गई है.
क्या यह ‘फॉरएवर वॉर’ की आहट है?
डिफेंस सेक्रेटरी हेगसेथ बार-बार कह रहे हैं कि ट्रंप प्रशासन पिछली सरकारों की तरह अमेरिकी साख को बर्बाद नहीं होने देगा. लेकिन अमेरिकी जनता की राय इसके उलट है. क्विनिपियाक यूनिवर्सिटी के पोल के मुताबिक, 74 परसेंट अमेरिकी जनता ईरान में सेना भेजने के खिलाफ है.
इतिहास गवाह है कि अफगानिस्तान और इराक में अमेरिका ने बड़ी उम्मीदों के साथ कदम रखा था, लेकिन वहां से निकलने में उसे दशकों लग गए और लाखों जानें गईं. ईरान की सेना अभी भी संगठित है और उसका कमांड स्ट्रक्चर टूटा नहीं है.
ऐसे में किसी भी छोटी सी जमीनी चूक का नतीजा एक भीषण ‘मैसाकर’ के रूप में निकल सकता है. क्या ट्रंप अपने समर्थकों को यह समझा पाएंगे कि यह युद्ध ‘अमेरिका फर्स्ट’ के लिए जरूरी है?
होर्मुज के पास हवाई किला बनाने की कोशिश में अमेरिका
फिलहाल की स्थिति को देखते हुए ऐसा लगता है कि अमेरिका पहले ‘एयर सुपीरियॉरिटी’ (हवाई प्रभुत्व) हासिल करने पर पूरा जोर लगा रहा है. A-10 वारथोग और अपाचे हेलीकॉप्टर्स अब होर्मुज के आसपास सक्रिय हैं. वे ईरान की ‘फास्ट अटैक बोट्स’ को चुन-चुनकर निशाना बना रहे हैं. लेकिन जैसा कि जनरल डैन केन ने संकेत दिया, दबाव हर दिन बढ़ता जा रहा है और अमेरिकी सेना ईरान के क्षेत्र में और गहराई तक जा रही है.
आने वाले हफ्तों में हम ’82nd एयरबोर्न डिवीजन’ की तैनाती देख सकते हैं. अगर वे किसी एयरफील्ड या रणनीतिक पॉइंट को कैप्चर करने में सफल रहते हैं, तो यह ईरान के लिए अंत की शुरुआत हो सकती है. लेकिन अगर ईरान के ‘बासीज’ और ‘IRGC’ ने पहाड़ों से गुरिल्ला युद्ध छेड़ दिया, तो यह आधुनिक इतिहास का सबसे महंगा और खूनी युद्ध साबित होगा.
क्या ट्रंप इस जोखिम के लिए तैयार हैं या यह केवल ईरान पर दबाव बनाने की एक मनोवैज्ञानिक चाल है? पूरी दुनिया की नजरें अब ओमान की खाड़ी और ईरान के तटों पर टिकी हैं.






