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मुल्‍क की मिट्टी कैसे छोड़ दें? मौत के साये में भी भागना नहीं चाहते ईरानी, खाली पड़ी तुर्की की सरहद

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तुर्की की सरहद पर खड़े कापिकोय बॉर्डर गेट की खामोशी आज बहुत कुछ कह रही है. आमतौर पर यहां सैलानियों का रेला होता था, व्यापार की चहल-पहल होती थी, लेकिन आज यहां का मंजर बदला हुआ है. एक तरफ पहाड़ियों से घिरा ये रास्ता है जो दुनिया के लिए खुला है, और दूसरी तरफ वो मुल्क है जिसके ऊपर युद्ध के काले बादल मंडरा रहे हैं. इजरायल और अमेरिका के हमलों के बाद ईरान का आसमान बंद है, उड़ानें थमी हुई हैं, और ये जमीनी रास्ता ही इकलौता जरिया बचा है बाहर निकलने का. लेकिन ताज्जुब की बात जानते हैं क्या है? बॉर्डर खुला है, रास्ता साफ है, मरने का डर भी है, पर ईरान के लोग भाग नहीं रहे. वो जा रहे हैं और वापस आ रहे हैं. उनके चेहरों पर खौफ से ज्यादा अपनी मिट्टी के प्रति वो जिद्दी लगाव दिख रहा है, जिसे दुनिया जिंदादिली कहती है. वे कह रहे… कैसे अपने मुल्‍क की मिट्टी छोड़ दें…
पहाड़ों के बीच बसे इस कापिकोय बॉर्डर पर जब हमारी मुलाकात कुछ मुसाफिरों से हुई, तो लगा था कि यहां भगदड़ मची होगी. लगा था कि लोग अपना सब कुछ छोड़-छाड़कर बस जान बचाकर भाग रहे होंगे. लेकिन हकीकत कुछ और ही निकली. यहां खड़े लोग शरणार्थी नहीं, बल्कि वो बाशिंदे हैं जिनकी जड़ें तेहरान, इस्फहान और तबरीज की गलियों में इतनी गहरी धंसी हैं कि बमों के धमाके भी उन्हें उखाड़ नहीं पा रहे.

38 साल के प्लास्टिक सर्जन रेजा गोल से जब बात हुई, तो उनकी आंखों में एक अजीब सा ठहराव था. वो उर्मिया से चलकर इस्तांबुल जा रहे थे. उन्होंने बड़े ही साफ लफ्जों में कहा, मैं तो अपने मरीजों को देखने जा रहा हूं. ये साफ नहीं है कि हम ईरान हमेशा के लिए छोड़ देंगे या नहीं. बस थोड़ा दिमाग शांत करने जा रहा हूं. आप खुद देखिए, बॉर्डर पर वैसी भीड़ नहीं है जैसी युद्ध के समय होती है. लोग अपने घरों में हैं. फिलहाल, कोई भी अपनी जिंदगी की जमा-पूंजी और यादें पीछे छोड़कर भागने को तैयार नहीं है.
रेजा की ये बात आज पूरे ईरान की कहानी कह रही है. लोग डरते जरूर हैं, क्योंकि जब आसमान से आग बरसती है तो दिल तो कांपता ही है, लेकिन वो ‘भगोड़ा’ कहलाना पसंद नहीं कर रहे.
हमारा तो सब कुछ वहीं है…
बॉर्डर पार करने वालों में पुनेह असगरी और उनके पति भी थे. उनके पास कनाडा की नागरिकता है, पासपोर्ट है, और वहां जाने का पूरा हक भी. लेकिन उनके चेहरे पर वो राहत नहीं थी जो सुरक्षित देश जाने वाले के चेहरे पर होती है. पुनेह कहती हैं, हम पिछले पांच सालों से ईरान में रह रहे हैं. कनाडा में अब हमारा घर भी नहीं है. हमारी पूरी जिंदगी ईरान में है. हम जा रहे हैं, लेकिन बस दुआ कर रहे हैं कि ये सफर छोटा हो और हम जल्द अपने घर लौट सकें.
ये वही दर्द है जो एक आम ईरानी महसूस कर रहा है. घर सिर्फ ईंट-पत्थर की दीवारें नहीं होता, वो बरसों की मेहनत और यादों का ठिकाना होता है. जब पुनेह जैसी महिलाएं, जिनके पास विदेश भागने का विकल्प है, वो भी भारी मन से जा रही हैं, तो समझा जा सकता है कि ईरान की मिट्टी में ऐसी क्या कशिश है.