० पूछताछ केंद्र से कर्मचारी नदारद, टेबल-दर-टेबल भटक रहे आवेदक, फाइलों और लाइसेंसों के लगे बंडल
० विधानसभा अध्यक्ष डॉ. रमन सिंह के क्षेत्र में प्रशासनिक लापरवाही पर भडक़े लोग, पूर्व सांसद अभिषेक सिंह से भी हो चुकी है शिकायत
ऊंची पहुंच की धौंस और जनप्रतिनिधियों से शिकायत बेअसर
चर्चा है कि अधिकारी विभागीय मंत्री से निकटता की धौंस दिखाकर दफ्तर में आने-जाने का कोई निश्चित समय तय नहीं रखते। इससे पूर्व भी परिवहन सलाहकारों एवं आम नागरिकों ने पूर्व सांसद अभिषेक सिंह से मिलकर अधिकारी की मनमानी व अव्यवस्थाओं की लिखित शिकायत की थी, लेकिन इसके बाद भी कार्यप्रणाली में कोई सुधार नहीं आया। उल्लेखनीय है कि राजनांदगांव विधानसभा क्षेत्र प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री व वर्तमान विधानसभा अध्यक्ष डॉ. रमन सिंह का गृह क्षेत्र है। ऐसे वीआईपी जिले के महत्वपूर्ण शासकीय विभाग में इस प्रकार की अराजकता से शासन-प्रशासन की छवि धूमिल हो रही है। जिससे नागरिकों में भारी रोष व्याप्त है।
राजनांदगांव (दावा)। अतिरिक्त क्षेत्रीय परिवहन कार्यालय (एआरटीओ) राजनांदगांव में प्रशासनिक व्यवस्थाएं पूरी तरह पटरी से उतर चुकी हैं। तत्कालीन अधिकारी के स्थानांतरण के बाद पदस्थ हुए परिवहन अधिकारी अनिल भगत के कथित मनमाने रवैये और लंबे समय से जमे कर्मचारियों की कार्यप्रणाली से अपने जरूरी काम कराने आ रहे नागरिक भीषण परेशानी झेल रहे हैं। शासन द्वारा निर्धारित सुबह 10 बजे से शाम 5 बजे तक कार्यालयीन समय होने के बावजूद दफ्तर में अफसरों की अनुपस्थिति और सुस्त कार्यशैली अब आम बात बन गई है।
मुख्यालय से दूरी और सरकारी वाहन से अप-डाउन
बताया जाता है कि राजनांदगांव जिला मुख्यालय होने के बावजूद अधिकारी यहां नियमित निवास नहीं करते। वे प्रतिदिन बाहर से शासकीय वाहन के जरिए अप-डाउन करते हैं। जिसकी पुष्टि वाहन के मीटर, लॉगबुक और मोबाइल लोकेशन से स्वत: हो सकती है। हफ्ते में कई दिन अधिकारी कार्यालय से नदारद रहे। कार्य निपटाने के बजाय मोबाइल में ही व्यस्त नजर आते है। दफ्तर के मुख्य द्वार पर पूछताछ केंद्र का बोर्ड तो लगा है, किंतु वहां कोई जिम्मेदार कर्मचारी उपस्थित नहीं रहता। कार्यालय में कई कर्मचारी 3 से 4 वर्ष और कुछ तो 5 से 6 वर्षों से अधिक समय से एक ही स्थान पर जमे हुए हैं। लंबे समय से पदस्थ होने के कारण उनका रवैया भी बेहद लापरवाह हो चुका है। वैध शुल्क और सभी औपचारिकताओं के साथ आवेदन जमा करने के बाद भी फाइलों और लाइसेंसों का गुम होना अथवा आवेदकों को वहां देख लो कहकर टरकाना आम हो गया है। अधिकारी के दस्तखत के अभाव में फाइलों व नए लाइसेंसों के बंडल धूल फांक रहे हैं।




