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पितृ पक्ष विशेष – गया 16 तिथि पितृ शांति महापूजा, तिल तर्पण एवं दीपदान

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पितृ पक्ष की 16 पवित्र तिथियों पर गया तीर्थ में पितृ शांति महापूजा, तिल तर्पण एवं दीपदान के माध्यम से अपने पूर्वजों की तृप्ति, शांति और सद्गति की प्रार्थना करें

पितृ पक्ष की 16 तिथियां क्यों मानी जाती हैं विशेष?

सनातन परंपरा में पितृ पक्ष पूर्वजों के स्मरण, श्राद्ध, तर्पण और पिंडदान के लिए समर्पित विशेष काल माना जाता है। इस दौरान अलग-अलग तिथियां उन पूर्वजों के निमित्त विशेष मानी जाती हैं, जिनका देहांत संबंधित चंद्र तिथि पर हुआ हो। इसी कारण परंपरागत रूप से पितृ कर्म का निर्धारण अंग्रेजी तारीख के बजाय पूर्वज की मृत्यु तिथि के आधार पर किया जाता है। इस विशेष अनुष्ठान में पितृ पक्ष की 16 तिथियों को ध्यान में रखते हुए पितृ शांति की प्रार्थना की जाएगी, ताकि कुल के ज्ञात-अज्ञात दिवंगत पूर्वजों के प्रति श्रद्धा अर्पित की जा सके।

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🌑 16 तिथियों का यह अनुष्ठान क्यों है इतना महत्वपूर्ण?

हर परिवार में पूर्वजों की सभी मृत्यु तिथियों का ज्ञान होना संभव नहीं होता।कई बार पीढ़ियां बीत जाने के कारण उनकी सही तिथि ज्ञात नहीं रहती। पितृ पक्ष में प्रत्येक तिथि का अपना महत्व है, जबकि अंत में आने वाली सर्व पितृ अमावस्या सभी ज्ञात-अज्ञात पूर्वजों, अज्ञात तिथि वाले पितरों और पहले श्राद्ध से छूट गए पूर्वजों के निमित्त विशेष मानी जाती है।

गया तीर्थ स्थल, गया

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बिहार स्थित गया भारत के सबसे प्राचीन और प्रतिष्ठित पितृ तीर्थों में से एक माना जाता है। यहां भगवान विष्णु से जुड़ा विष्णुपद क्षेत्र और पवित्र फल्गु नदी पिंडदान, श्राद्ध और तर्पण की प्राचीन परंपरा से जुड़े हुए हैं। गया की धार्मिक महिमा भगवान विष्णु और गयासुर की कथा से जुड़ी है। साथ ही रामायण परंपरा में भगवान श्रीराम और माता सीता द्वारा महाराज दशरथ के निमित्त गया में पितृ कर्म किए जाने की कथा भी इस तीर्थ की पितृ परंपरा को विशेष बनाती है।

यही कारण है कि पीढ़ियों से श्रद्धालु अपने पूर्वजों के निमित्त पिंडदान, श्राद्ध और तर्पण के लिए गया आते रहे हैं। पितृ पक्ष के दौरान इस पवित्र तीर्थ में 16 तिथियों को समर्पित पितृ शांति महापूजा, तिल तर्पण एवं दीपदान करना विशेष आध्यात्मिक महत्व रखता है।