कर्नाटक में महीनों से जारी राजनीतिक नाटक का अब पटाक्षेप होने वाला है. कांग्रेस हाईकमान के निर्देश के बाद सिद्दारमैया मुख्यमंत्री पद की कुर्सी छोड़ने को तैयार हो गए हैं. सीएम पद से इस्तीफा देने से पहले सिद्दारमैया ने ब्रेकफास्ट मीटिंग बुलाई, जिसमें पहुंचे डीके शिवकुमार ने मुख्यमंत्री के पैर छूकर बड़ा राजनीतिक संदेश दे दिया.
कर्नाटक की राजनीति में एक बार फिर सत्ता परिवर्तन की पटकथा लिखी जाती दिखाई दे रही है. मुख्यमंत्री सिद्दारमैया के इस्तीफे की अटकलों के बीच गुरुवार सुबह बेंगलुरु में हुई ब्रेकफास्ट मीटिंग ने राजनीतिक संकेतों को और मजबूत कर दिया. इस बैठक में उपमुख्यमंत्री डीके शिवकुमार समेत कई मंत्री शामिल हुए. सबसे अधिक चर्चा उस तस्वीर की रही जिसमें डीके शिवकुमार ने सार्वजनिक रूप से सिद्दारमैया के पैर छूकर उनका आशीर्वाद लिया. कांग्रेस नेतृत्व की अंदरूनी राजनीति में इस दृश्य को केवल शिष्टाचार नहीं, बल्कि एक बड़े राजनीतिक संदेश के रूप में देखा जा रहा है.
दरअसल, कांग्रेस के सामने सबसे बड़ी चुनौती केवल नेतृत्व परिवर्तन नहीं, बल्कि सत्ता संतुलन बनाए रखने की है. पार्टी जानती है कि सिद्दारमैया सिर्फ एक मुख्यमंत्री नहीं, बल्कि कर्नाटक में कांग्रेस के सबसे बड़े जनाधार वाले नेता हैं. खासकर AHINDA (अल्पसंख्यक, पिछड़ा वर्ग और दलित) सामाजिक समीकरण पर उनकी मजबूत पकड़ रही है. 2023 विधानसभा चुनाव में कांग्रेस की भारी जीत के पीछे भी इसी सामाजिक गठजोड़ को सबसे बड़ा कारण माना गया था. ऐसे में यदि उन्हें अचानक सत्ता से हटाया जाता है और उनके समर्थकों को सम्मानजनक हिस्सेदारी नहीं मिलती, तो इसका सीधा असर कांग्रेस के पारंपरिक वोट बैंक पर पड़ सकता है. स्वाभाविक है कि डीके शिवकुमार की नजर इसी अहिंदा वोट बैंक पर है.
अहिंदा वोट बैंक पर नजर
कर्नाटक में नेतृत्व परिवर्तन की अटकलों के बीच सबसे बड़ा सवाल यह बन गया है कि अगर मुख्यमंत्री सिद्दारमैया पद छोड़ते हैं तो कांग्रेस के पारंपरिक ‘अहिंदा’ वोट बैंक पर इसका कितना असर पड़ेगा. राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि 2028 विधानसभा चुनावों में कांग्रेस की स्थिति काफी हद तक इस बात पर निर्भर करेगी कि सिद्दारमैया के बाद पार्टी इस सामाजिक गठजोड़ को कितनी मजबूती से संभाल पाती है. अहिंदा यानी अल्पसंख्यक, दलित और पिछड़े वर्ग लंबे समय से कांग्रेस की सामाजिक और राजनीतिक ताकत रहे हैं. हालांकि, इस अवधारणा की शुरुआत सिद्दारमैया ने नहीं की थी, लेकिन उन्होंने इसे स्पष्ट राजनीतिक पहचान और नेतृत्व दिया. साल 2005 में जनता दल (सेक्युलर) से निष्कासन के बाद उन्होंने अहिंदा आंदोलन को आगे बढ़ाया और 2006 में अपने समर्थक नेताओं के साथ कांग्रेस में शामिल होकर इस वर्ग के सबसे बड़े चेहरे बनकर उभरे. इसके बाद वे दो बार मुख्यमंत्री बने.
सिद्दारमैया ने अपने पुराने जेडी(एस) सहयोगियों जैसे डॉ. एचसी महादेवप्पा, सतीश जारकीहोली, जमीर अहमद खान और बायरथी सुरेश को आगे बढ़ाकर अहिंदा राजनीति को मजबूत किया. इस प्रक्रिया में कांग्रेस के पुराने नेताओं जैसे डॉ. जी. परमेश्वर, पीएम नरेंद्रस्वामी, एचएम रेवन्ना, रोशन बेग और तनवीर सैत का प्रभाव अपेक्षाकृत कम होता गया. पार्टी के वरिष्ठ नेताओं के अनुसार, सिद्दारमैया ने पूर्व मुख्यमंत्री देवराज अर्स की सामाजिक न्याय की राजनीति को आगे बढ़ाते हुए ओबीसी नेतृत्व का विस्तार किया और वोक्कालिगा-लिंगायत-ब्राह्मण प्रभुत्व को संतुलित रखने की कोशिश की.
2023 का विधानसभा चुनाव
साल 2023 विधानसभा चुनाव में कांग्रेस को 43 प्रतिशत वोट और 135 सीटों की ऐतिहासिक जीत मिली. पार्टी ने अनुसूचित जाति की 36 में से 21 और अनुसूचित जनजाति की 15 में से 14 सीटें जीतीं. हालांकि, विश्लेषकों का मानना है कि यह जीत केवल अहिंदा राजनीति का परिणाम नहीं थी. डीके शिवकुमार की संगठनात्मक रणनीति, बीएस येदियुरप्पा के हटने के बाद भाजपा से नाराज लिंगायत वोट, कांग्रेस की ‘गारंटी योजनाएं’ और वोक्कालिगा समुदाय का समर्थन भी अहम कारण रहे.
सिद्दारमैया की भूमिका पर टिकी नजरें
एक्सपर्ट की मानें तो अहिंदा वोट बैंक का भविष्य इस बात पर निर्भर करेगा कि सिद्दारमैया सत्ता से हटने को किस तरह संभालते हैं और अगले दो वर्षों में पार्टी के साथ उनकी भूमिका क्या रहती है. उन्होंने यह भी कहा कि गैर-प्रभावशाली ओबीसी वर्ग का एक हिस्सा पहले ही भाजपा की ओर झुकने लगा था. यदि सिद्दारमैया राज्यसभा भेजे जाते हैं तो कांग्रेस के सामने अहिंदा वोटरों के अलगाव का खतरा पैदा हो सकता है. हालांकि, जानकार मानते हैं कि उनका हटना अहिंदा राजनीति को तुरंत खत्म नहीं करेगा, लेकिन कांग्रेस के लिए इस सामाजिक गठजोड़ को एकजुट रखना, नए नेतृत्व को आगे लाना और कल्याणकारी योजनाओं की निरंतरता बनाए रखना बड़ी चुनौती होगी.






