Middle East War: पश्चिम एशिया (मिडिल ईस्ट) में गहराता युद्ध का साया केवल दो देशों की सरहदों तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका सीधा असर आपकी रसोई और मासिक बजट पर पड़ने वाला है. भारत अपनी जरूरत की कई बुनियादी चीजों के लिए इस क्षेत्र पर निर्भर है. वहां छिड़ी Iran Israel and US War के कारण न केवल ईंधन महंगा होगा, बल्कि रोजमर्रा के इस्तेमाल वाली दवाओं से लेकर खाने-पीने के सामान तक की कीमतें आसमान छूने वाली हैं. यह आर्थिक सुनामी सप्लाई चेन टूटने की वजह से आने वाली है, जिसे समझना हर उपभोक्ता के लिए बेहद जरूरी है.
मिडिल ईस्ट से आने वाली किन चीजों के बढ़ेंगे दाम?
मिडिल ईस्ट के तनाव का सबसे पहला और गहरा प्रहार कच्चे तेल और प्राकृतिक गैस पर होगा. दुनिया की लगभग 20 प्रतिशत तेल आपूर्ति होर्मुज जलडमरूमध्य के रास्ते होती है. युद्ध के कारण इस मार्ग के बाधित होने से अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल के दाम बढ़ेंगे, जिससे भारत में पेट्रोल, डीजल और सीएनजी की कीमतें बढ़ना तय है. जब परिवहन महंगा होगा, तो माल ढुलाई की लागत बढ़ने से बाजार की हर छोटी-बड़ी चीज महंगी हो जाएगी.
ड्राई फ्रूट्स और पकवानों का स्वाद होगा कड़वा
भारत में मेवों की एक बड़ी खेप ईरान और आसपास के देशों से आती है. बादाम, पिस्ता और खजूर जैसी चीजों की आपूर्ति रुकने या कम होने से दिल्ली की खारी बावली जैसे प्रमुख थोक बाजारों में कीमतें तेजी से बढ़ने लगी हैं. त्योहारों और शादी-ब्याह के सीजन में ड्राई फ्रूट्स की मांग अधिक होती है, ऐसे में युद्ध की स्थिति इन खास व्यंजनों के जायके को जेब पर भारी बना सकती है.
पैकेजिंग मटेरियल में 40 प्रतिशत की भारी बढ़त
जंग का एक बड़ा असर उन चीजों पर भी पड़ रहा है जो सीधे तौर पर दिखाई नहीं देतीं, जैसे पैकेजिंग मटेरियल. पेट रीजन और अन्य पैकिंग सामग्री की लागत में 40 प्रतिशत तक का उछाल आने की आशंका है. प्लास्टिक की बोतलों से लेकर खाने-पीने के पैकेट तक, सभी की उत्पादन लागत बढ़ जाएगी. इसका सीधा मतलब यह है कि साबुन, तेल, बिस्किट और अन्य एफएमसीजी उत्पादों के दाम भी कंपनियां बढ़ाने पर मजबूर होंगी.
खेती-किसानी और खाद पर संकट के बादल
भारत खेती के लिए जरूरी उर्वरकों, विशेषकर यूरिया और डीएपी के लिए काफी हद तक मिडिल ईस्ट के देशों पर निर्भर है. युद्ध के कारण इन उर्वरकों की सप्लाई चेन टूटने से खेती की लागत बढ़ जाएगी. अगर किसानों को समय पर और किफायती दामों में खाद नहीं मिली, तो इसका असर अनाज और सब्जियों के उत्पादन पर पड़ेगा. अंततः यह संकट आम आदमी की थाली तक पहुंचेगा और खाद्य मुद्रास्फीति को बढ़ावा देगा.
दवाएं और इलेक्ट्रॉनिक सामान भी होंगे महंगे
सिर्फ खाना-पीना ही नहीं, बल्कि स्वास्थ्य सेवाएं और तकनीक भी इस युद्ध की चपेट में हैं. दवाओं को बनाने में इस्तेमाल होने वाले कई रसायनों और इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों की सप्लाई पर भी बुरा असर पड़ रहा है. कच्चे माल की कमी के कारण जीवन रक्षक दवाओं की कीमतें बढ़ सकती हैं. इसके अलावा, मेटल और केमिकल्स की कमी से निर्माण और निर्माण क्षेत्र से जुड़ी अन्य गतिविधियों पर भी ब्रेक लग सकता है, जिससे विकास की रफ्तार धीमी पड़ जाएगी.






