मध्य पूर्व में बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव के कारण कच्चे तेल की कीमतों में मानो आग लग गई है। का भाव **$119** प्रति बैरल के करीब पहुंच गया है, जो कि **2022** के बाद का सबसे बड़ा उछाल है। इस बढ़ोतरी ने ‘स्टैगफ्लेशन’ यानी धीमी आर्थिक ग्रोथ के साथ बढ़ती महंगाई के डर को और हवा दे दी है।
तेल की कीमतों में क्यों आई सुनामी?
मध्य पूर्व में जारी संघर्ष की वजह से कच्चे तेल की सप्लाई पर गहरा असर पड़ा है, जिससे वैश्विक बाजार में कीमतें रिकॉर्ड ऊंचाई पर पहुंच गई हैं। इस समय $119 प्रति बैरल के आस-पास कारोबार कर रहा है। यह स्थिति 2022 के बाद सबसे खतरनाक मानी जा रही है। जानकारों का मानना है कि होर्मुज जलडमरूमध्य जैसे महत्वपूर्ण समुद्री रास्तों पर संभावित रुकावटों से सप्लाई और भी टाइट हो सकती है। इतिहास गवाह है कि जब भी ऐसे संघर्ष हुए हैं, कच्चे तेल की कीमतों में भारी उतार-चढ़ाव देखा गया है, जिसने सीधे तौर पर वैश्विक अर्थव्यवस्थाओं को प्रभावित किया है।
‘स्टैगफ्लेशन’ का खतरा और फेडरल रिजर्व की मुश्किल
तेल की कीमतों में इस बेतहाशा उछाल ने ‘स्टैगफ्लेशन’ के खतरे को फिर से जिंदा कर दिया है। यह एक ऐसी स्थिति होती है, जहां एक तरफ तो अर्थव्यवस्था की ग्रोथ धीमी पड़ जाती है और दूसरी तरफ महंगाई लगातार बढ़ती रहती है। बाजार के लिए यह सबसे बड़ा जोखिम बन गया है। निवेशकों को डर है कि अगर कच्चे तेल की कीमतें यूं ही बढ़ती रहीं, तो महंगाई काबू से बाहर हो सकती है। ऐसे में, अमेरिकी सेंट्रल बैंक, फेडरल रिजर्व को ब्याज दरें घटाने में हिचकिचाहट हो सकती है, या फिर वे इस फैसले को टाल सकते हैं।
एक अनुमान के मुताबिक, अगर तेल की कीमतों में 35% की बढ़ोतरी लगातार जारी रही और होर्मुज जलडमरूमध्य में समस्या बनी रही, तो अमेरिकी शेयरों में 13% तक की गिरावट आ सकती है और डॉलरऔर मजबूत हो सकता है। अमेरिकी 10-साल के ट्रेजरी यील्ड पहले ही 4.22% के पार जा चुके हैं, जो फरवरी 2026 के बाद का सबसे ऊंचा स्तर है। पिछले एक महीने में डॉलर इंडेक्स में 2.5% से ज्यादा की मजबूती आई है।
वैश्विक बाजारों पर असर
तेल की कीमतों में इस उछाल और बढ़ते भू-राजनीतिक जोखिमों का असर दुनिया भर के बाजारों पर दिख रहा है। अमेरिकी स्टॉक फ्यूचर्स में भारी गिरावट दर्ज की गई। एशियाई बाजारों में भी बिकवाली हावी रही, टोक्यो का निक्केई 7% तक लुढ़क गया। भारत का सेंसेक्स (BSE Sensex) भी 2025 के अप्रैल महीने के बाद के अपने निचले स्तर पर आ गया। 1973 की ‘योम किप्पुर वॉर’ और 1990 के ‘गल्फ वॉर’ जैसे संकटों के दौरान भी तेल की कीमतों में उछाल के बाद शेयर बाजारों में दोहरे अंकों की गिरावट देखी गई थी।
नीतिगत गलती का जोखिम
लगातार बढ़ती तेल की कीमतों से फेडरल रिजर्व से नीतिगत गलती होने का जोखिम बढ़ गया है। महंगाई पहले से ही 2% के लक्ष्य से ऊपर है, ऐसे में ऊर्जा की लागत बढ़ने से ये और भड़क सकती है। इससे फेडरल रिजर्व को ऊंची ब्याज दरें लंबे समय तक बनाए रखनी पड़ सकती हैं, जो आर्थिक ग्रोथ के लिए नुकसानदायक हो सकता है। कुछ अर्थशास्त्रियों का मानना है कि फेड इस साल कोई भी इंटरेस्ट रेट कट नहीं करेगा, जो बाजार की दो बार कट की उम्मीदों के बिल्कुल विपरीत है। 1970 के दशक के तेल संकटों से यह सबक लिया गया है कि शुरुआती नरमी भरी नीतियां महंगाई को और बढ़ा सकती हैं, जिसे फेड बचाना चाहेगा।
फेड के गवर्नर क्रिस्टोफर वालर का कहना है कि मौजूदा संघर्ष से महंगाई पर दीर्घकालिक असर नहीं पड़ेगा, लेकिन बाजार अभी भी सतर्क है। 4.22% पर चल रहा अमेरिकी 10-साल का ट्रेजरी यील्ड और मजबूत होता डॉलर, जोखिम वाली संपत्तियों के लिए एक कठिन माहौल का संकेत दे रहे हैं, और कम उधार लागत से किसी भी आर्थिक सुधार को टाल सकते हैं। यह स्थिति ‘स्टैगफ्लेशन’ के जोखिम को और बढ़ाती है, जहां महंगाई तो ऊंची बनी रहती है लेकिन ग्रोथ सुस्त पड़ जाती है।






