नई दिल्ली – सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अगर किसी उम्रकैद की सजा पाए कैदी की अपील पर सुनवाई के दौरान उसे बरी होने का अच्छा मौका दिखता है, तो उसे जमानत दी जा सकती है। शीर्ष अदालत ने यह बात एक मामले की सुनवाई के दौरान कही। दरअसल, तमिलनाडु के एक पुलिस अधिकारी को 1999 में हुई एक हिरासत में मौत के मामले में उम्रकैद की सजा सुनाई गई थी। सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस जेबी पारदीवाला और केवी विश्वनाथन की बेंच ने इस पुलिस अधिकारी की सजा को सस्पेंड कर दिया।
सर्वोच्च अदालत ने फैसले में क्या कहा
सर्वोच्च अदालत ने यह फैसला तब लिया गया जब वरिष्ठ वकील मुकुल रोहतगी और आनंद वर्मा ने अभियोजन पक्ष के गवाहों की गवाही में विरोधाभास की ओर इशारा किया। कोर्ट ने कहा कि जब उम्रकैद की सजा को निलंबित करने की बात आती है, तो विचार अलग होते हैं। अगर किसी तय अवधि की सजा का मामला हो, तो अपील कोर्ट आमतौर पर इसे आसानी से निलंबित कर सकता है, जब तक कि इसे रोकने के कोई खास कारण न हों। लेकिन उम्रकैद के मामले में, अपील कोर्ट को यह देखना चाहिए कि क्या रिकॉर्ड पर ऐसी कोई बात है जिससे लगे कि अपीलकर्ता की अपील सफल हो सकती है और उसे बरी किया जा सकता है।
गवाहों के गवाही में टकराव का जिक्र
शीर्ष कोर्ट ने कहा कि पहली नजर में, उन्हें गवाह नंबर 4 और गवाह नंबर 5 की गवाही में गवाह नंबर 2 की गवाही से सीधे टकराव दिखा। अदालत ने यह भी कहा कि यह कानून अच्छी तरह से स्थापित है। एक अकेले गवाह की गवाही के आधार पर भी सजा सुनाई जा सकती है, बशर्ते वह गवाही पूरी तरह भरोसेमंद हो। अगर गवाही बिल्कुल भी भरोसेमंद न हो, तो उसे पूरी तरह से खारिज करने में कोई दिक्कत नहीं है।
इसलिए SC ने पुलिस अधिकारी की सजा को किया सस्पेंड
एक तीसरी स्थिति ऐसी भी हो सकती है, जहां कोर्ट को लगे कि अकेले गवाह की गवाही न तो पूरी तरह भरोसेमंद है और न ही पूरी तरह अविश्वसनीय। ऐसी स्थिति में, कोर्ट को महत्वपूर्ण बातों में गवाही के समर्थन की आवश्यकता होगी। हमने गवाह नंबर 4 और गवाह नंबर 5 की गवाही को सरसरी तौर पर देखकर यही करने की कोशिश की।
शीर्ष अदालत ने टिप्पणी में क्या कुछ कहा
पहली नजर में, मौखिक गवाही पर भरोसा नहीं किया जा सकता। इन परिस्थितियों में, हम हाई कोर्ट में लंबित आपराधिक अपील के अंतिम निपटारे तक सजा के मुख्य आदेश को निलंबित करने की अपीलकर्ता की दलील को स्वीकार करने के लिए राजी हैं। इस हालात में, हम अपील करने वाले की यह दलील मानने के लिए राजी हैं कि हाई कोर्ट में उसकी क्रिमिनल अपील का आखिरी निपटारा होने तक सजा के मुख्य आदेश को सस्पेंड कर दिया जाए। पीठ ने ये भी कहा कि अदालत ने इस मामले में कोई भी फैसला नहीं सुनाया है।






