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सरकारी नीतियों से प्रभावित या मरने का खौफ? 29 माओवादियों ने डाले हथियार

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जिले में नक्सल उन्मूलन अभियान के तहत सुरक्षा बलों को एक उल्लेखनीय कामयाबी मिली है। लगातार बढ़ रहे दबाव और प्रभावी रणनीति के चलते 29 पुरुष नक्सलियों ने आत्मसमर्पण कर मुख्यधारा में लौटने का निर्णय लिया है। यह घटनाक्रम क्षेत्र में शांति और सुरक्षा स्थापित करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।
सुकमा – साल 2026 में, सुकमा के गोगुंडा में सबसे बड़ा नक्सली सरेंडर हुआ है. एक साथ 29 खूंखार माओवादियों ने पुलिस के सामने हथियार डाल दिए हैं. हिंसा का रास्ता छोड़ समाज की मुख्यधारा में शामिल होने वाले सभी माओवादियों पर कई संगीन आरोप दर्ज हैं. सरेंडर करने वाले माओवादियों की लंबे वक्त से पुलिस को तलाश रही है. एक साथ इतनी बड़ी संख्या में माओवादियों के सरेंडर किए जाने से पुलिस प्रशासन के अधिकारी काफी खुश हैं.
सुकमा के गोगुंडा में ये इस साल का सबसे बड़ा नक्सली सरेंडर है. गोगुंडा क्षेत्र, जो कभी दरभा डिवीजन के माओवादियों के लिए सबसे सुरक्षित ठिकानों में से एक रहा है, वहां पर इतनी बड़ी संख्या में माओवादियों का सरेंडर करना पुलिस के लिए बड़ी सफलता मानी जा रही है.
हाल ही में गोगुंडा में नए पुलिस कैंप की स्थापना की गई है. नया पुलिस कैंप बनने के बाद से इलाके में सक्रिय माओवादियों पर काफी हद तक लगाम लगी. एनकाउंटर में मारे जाने के डर से माओवादियों ने हथियार डालने का फैसला लिया. पुलिस लगातार गांव वालों के माध्यम से भी अपील कर रही है कि बचे हुए नक्सली हथियार डाल समाज की मुख्यधारा में लौट आएं.
रंग ला रही सरकार की नक्सल पुनर्वास नीति
सरकार की नई पुनर्वास नीति भी रंग ला रही है. पूना नर्कोम योजना के फायदे देख नक्सली अब हथियार छोड़ समाज की मुख्यधारा में लौटने लगे हैं. माओवादियों को अब ये पता चल गया है कि पुलिस कैंप खुलने के बाद से वो सुरक्षित नहीं हैं. सक्रिय नक्सलियों पर परिवार वालों का भी दबाव है. नक्सलियों के परिवार वाले भी अब हिंसा से तंग आ चुके हैं. वो चाहते हैं उनका उनका पति और बेटा बेटी घर लौट आएं, परिवार की जिम्मेदारी उठाएं.
दुर्गम इलाकों में होती है गोगुंडा की गिनती
जिस गोगुंडा इलाके में माओवादियों ने सरेंडर किया है, वो इलाका दुर्गम और पहाड़ों, जंगलों से घिरा है. गोगुंडा की भौगोलिक स्थिति ऐसी है कि वहां पर तत्काल किसी का पहुंचना मुश्किल होता है. इसी का फायदा उठाकर माओवादियों ने इसे अपना सुरक्षित ठिकाना बना रखा था. लेकिन जब से गोगुंडा में पुलिस कैंप की स्थापना हुई है, तब से यहां पर नक्सल मूवमेंट पर पूरी तरह से लगाम लग गया है.
ग्रामीणों का नहीं मिल रहा माओवादियों को सपोर्ट
जिन माओवादियों का समर्थन कभी गांव के लोग किया करते थे अब वो विकास चाहते हैं, हिंसा नहीं. इसलिए माओवादियों को ग्रामीणों का सपोर्ट मिलना भी बंद हो चुका है. माओवादी अब फोर्स और गांव वालों दोनों से बचकर रहने को मजबूर हैं. लॉजिस्टिक सपोर्ट और खाने पीने का सामान भी उनको मुश्किल से मिल रहा है. दवा और खाने के अभाव में नक्सली बीमार और कमजोर हो रहे हैं. लगातार माओवादियों के मारे जाने और सरेंडर की घटनाओं से बचे हुए नक्सली दहशत में जी रहे हैं.
हिंसा नहीं विकास चाहते हैं ग्रामीण
गांव वाले चाहते हैं कि उनको घरों तक पक्की सड़क, पीने के पानी का पाइपलाइन और मोबाइल का नेटवर्क पहुंचे. शासन की मदद से ये सभी सुविधाएं तेजी से गांव गांव तक पहुंचने लगी है. बीमार लोगों को ले जाने के लिए गांव तक एंबुलेंस आने लगी है. पीडीएस का राशन अब आसानी से उनके ही गांव में मिलने लगा है. बच्चे फिर से स्कूल जाने लगे हैं. रोजी रोजगार के लिए युवा शहरों का रुख कर रहे हैं. इन सब वजहों से नक्सल प्रभावित गांवों की तस्वीर अब बदलने लगी है. गांव के लोग सुविधाएं चाहते हैं, हिंसा और बम बारूद की आवाज नहीं.
सुकमा एसपी किरण चव्हाण और सीआरपीएफ कमांडेंट का बयान

 

पुलिस अधीक्षक किरण चव्हाण ने कहा, गोगुंडा में सुरक्षा कैंप की स्थापना से क्षेत्र में स्थायी सुरक्षा और विकास का वातावरण बना है. लगातार दबाव और ‘पूना मार्गेम’ नीति के कारण माओवादी मुख्यधारा में लौट रहे हैं. 74वीं वाहिनी सीआरपीएफ के कमांडेंट हिमांशु पांडे कहते हैं, कैंप खुलने के बाद माओवादियों की पकड़ कमजोर पड़ी है और सुरक्षा, विश्वास और विकास की संयुक्त रणनीति से नक्सलवाद का अंत संभव हो रहा है.