अभिनेता संजय मिश्रा ने बॉलीवुड में स्टारडम और अभिनेताओं के नखरों पर अपनी बेबाक राय रखी है। 62 वर्षीय मिश्रा ने बताया कि वे स्टारडम के चक्कर में क्यों नहीं पड़ते। उन्होंने यह भी साझा किया कि वे फिल्में कैसे चुनते हैं, जिसमें कहानी को महसूस करना उनके लिए स्क्रिप्ट पढ़ने से ज्यादा महत्वपूर्ण है। उनके बयान कई एक्टर्स को चुभ सकते हैं।
मुंबई – ‘जस्ट चिल पगलू’ इतना सुनते ही अगर दिमाग में सबसे पहले किसी एक्टर का नाम आता है, तो वह संजय मिश्रा हैं। 62 साल की उम्र में भी वह दर्शकों को लगातार एंटरटेन कर रहे हैं। बीते दिनों अभिनेता सोशल मीडिया पर खूब छाए रहे थे, जब वह महिमा चौधरी के दूल्हे बनकर आ गए थे। पहले तो फैंस काफी हैरान और परेशान हुए, लेकिन बाद में उन्होंने बता दिया कि ये उनकी फिल्म ‘दुर्लभ प्रसाद की दूसरी शादी’ का प्रमोशन है।
बॉलीवुड में कई कलाकार आते तो एक्टर बनकर हैं, लेकिन अगर उनकी फिल्में चल जाए तो वह स्टारडम के शिखर पर बैठना चाहते हैं। हालांकि, संजय मिश्रा के साथ ऐसा नहीं है। 200 से ज्यादा फिल्में कर चुके संजय मिश्रा ने बताया कि वह अपने लंबे सफर में कभी स्टारडम के चक्कर में क्यों नहीं फंसे, साथ ही उन्होंने कुछ असा बोला, जिससे कई एक्टर्स को मिर्ची लग सकती है।
इस कारण स्टारडम वाले चक्कर से रहते हैं दूर
मुंबई मनोरंजन संवाददाता की खबर के मुताबिक, संजय स्टारडम जैसे शब्दों में भी नहीं फंसते हैं। वह कहते हैं कि स्टारडम के चक्कर में लोग कई लोगों को अपने साथ लेकर चलते हैं। उन्हें कोई चाहिए होता है, जो उनके लिए पंखे बंद कर दे, पानी का गिलास लाकर दे दे। यह ऐसे काम हैं, जो मैं खुद कर सकता हूं। मैं ऐसे चक्करों में नहीं पड़ता।
फिल्में चुनने का क्या है उनका नियम?
फिल्मों में हर कलाकार का काम करने का अपना तरीका होता है, कुछ नियम होते हैं, जिसके अनुसार वह काम करते हैं। ‘वध’ फिल्म के अभिनेता संजय मिश्रा का भी किसी प्रोजेक्ट को हां कहने का एक ही तरीका है। वह कहते हैं, ‘मैं अपने काम में थोड़ा स्वार्थ रखता हूं। मैं कभी फिल्म की कहानी नहीं पढ़ता या यह नहीं पूछता कि मेरा रोल कैसा है। अगर आप मुझे कहानी सुना रहे हैं और वह कहानी सुनाते समय आपने मुझे पूरी फिल्म मेरी नजरों के सामने ला दी, तो मैं फिल्म के लिए हां कह देता हूं। कुछ लोग पूरी कहानी बोल जाते हैं, लेकिन फिल्म दिखती ही नहीं है। मेरे लिए बस यही चीज मायने रखती है कि कहानी में क्या होने वाला है, वो मुझे दिखा दो। बाकी तो फिल्म सेट पर ही बनती है। वहां जो हम शूट करते हैं, जो बदलाव होते हैं, वह फिल्म को सही मायनों में बनाते हैं।’






