मधुप पांडेय ऐसे कवि रहे हैं जिन्हें समय, काल और परिस्थितियों का ज्ञान था और मानवीय मनोविज्ञान का भी. उनकी कविताएं पाठकों से सीधा संवाद करती हैं. मधुप पांडेय की कविताओं में व्यक्ति विशेष का विरोध नहीं बल्कि प्रवृतिगत विसंगतियों पर प्रहार है.
नागपुर – हिंदी काव्य की दुनिया में चर्चित कवि और हास्य व्यंग्य के पुरोधा मधुप पांडेय का आज निधन हो गया. वे 82 वर्ष के थे. मधुप पांडेय के निधन पर काव्य जगत के लोगों ने शोक व्यक्त किया है. केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी ने भी उनके निधन पर दुख प्रकट किया है. साहित्यकार, व्यंग्यकार और कुशल मंच संचालक मधुप पांडेय पिछले कुछ समय से बीमार चल रहे थे. मधुप पांडेय नागपुर के रहने वाले थे और वे एक कॉलेज में कॉमर्स के प्रोफेसर थे.
केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी मधुप पांडेय के छात्र रहे हैं. उन्होंने अपने सोशल मीडिया पेज पर अपने टीचर को श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए लिखा है- “नागपुर के प्रख्यात साहित्यकार मधुप पांडेय सर के निधन का समाचार दुखद है. उन्हें मेरी भावभीनी श्रद्धांजलि. पांडेय सर ने देश-विदेश में काव्य गोष्ठियों में भाग लेकर अपनी प्रस्तुतियों से एक बड़ा प्रशंसक वर्ग तैयार किया. उनके साहित्य को अनेक पुरस्कारों से सम्मानित किया गया. उनका विद्यार्थी होने के नाते मैंने उनके साहित्य का भी आनंद लिया. ईश्वर दिवंगत आत्मा को शांति और उनके परिवार को यह दुःख सहने की शक्ति दे.”
प्रसिद्ध कवि डॉ. प्रवीण शुक्ल ने मधुप पांडेय के निधन को काव्य जगत खासकर हिंदी कवि सम्मेलनों की दुनिया में एक बड़ी क्षति बताया है. प्रवीण शुक्ल ने उन्हें याद करते हुए बताया कि मधुप पांडेय को विदर्भ, छत्तीसगढ़ और महाराष्ट्र में कवि सम्मेलनों का जनक माना जाता है. उन्होंने बताया कि उन्होंने मधुप जी के साथ कई मंचों पर काव्य पाठ किया है.
मशहूर हास्य कवि प्रवीण शुक्ल बताते हैं कि मधुप पांडेय बहुमुखी प्रतिभा के धनी थे. वे कवि सम्मेलनों की सतत् शृंखला आयोजित करवाने के लिए जाने जाते हैं. मधुप पांडेय लगातार 15-20 दिन तक कवि सम्मेलनों का आयोजन करते थे. और हर दिन अलग-अलग जगहों पर काव्य पाठ होता था. इस तरह के कार्यक्रमों का सफलतापूर्वक आयोजन करवाना एक बड़ी उपलब्धि है और यह विशेषता केवल मधुप पांडेय में ही थी.
प्रवीण शुक्ल बताते हैं कि मधुप पांडेय एक कॉलेज में कॉमर्स के प्रोफेसर थे और अध्यापन के साथ-साथ वे हिंदी साहित्य और काव्य का प्रचार-प्रसार कर रहे थे. नवभारत अखबार में उनका एक साप्ताहिक कॉलम ‘मधुपजी का कोना’ नाम से प्रकाशित होता था. इसमें वे समसामायिक घटना पर हास्य व्यंग्य लिखते थे. यह कॉलम इतना चर्चित था कि लोगों को इसका इंतजार रहता था. प्रवीण बताते हैं कि इस कॉलम की वजह से मधुप की लोकप्रियता देश के कोने-कोने में पहुंची. वे अगर किसी ट्रेन से किसी स्टेशन पर उतर रहे हैं तो वहां के कुली या अन्य लोग उन्हें कॉलम की वजह से पहचान लेते थे. यह कॉलम लगातार 36 वर्ष तक चला, जोकि अपने-आप में एक बड़ी उपलब्धि है.
प्रवीण शुक्ल मधुप पांडेय के कुशल संचालन को याद करते हुए बताते हैं कि मधुपजी अपनी अनूठी संचालन शैली के लिए भी प्रसिद्ध थे. वे अपने संचालन में शेर-शायरी, कविता और चुटकलों का ऐसा सम्मिश्रण करते थे कि कवि सम्मेलन और भी रोचक हो जाता था. मधुप जी को एक सुव्यवस्थित कवि के तौर पर भी जाना जाता है. वे हर काम को लिखकर तय समय पर किया करते थे. उनके कवि सम्मेलनों में मर्यादा का बहुत ही ख्याल रखा जाता था. कवि सम्मेलन शुरू होने से पहले मधुप जी सभी कवियों के साथ बैठकर कवियों की रचनाओं और उनके समय पर चर्चा किया करते थे.
कवि प्रवीण शुक्ल सोशल मीडिया पर एक पोस्ट में लिखते हैं- “अनेक यात्राओं में उनके सानिध्य और आशीर्वाद का अवसर प्राप्त हुआ. उनकी दो पुस्तकें संपादित करने के दौरान मैंने उनकी कार्यशैली को बहुत नजदीक से देखा. उनके स्नेह निमंत्रण पर मुझे परिवार सहित उनके निवास पर भी उनके सानिध्य में रहने का सौभाग्य मिला. उन जैसा सुव्यवस्थित और निरंतर लिखने वाला कवि अपने आप में एक उदाहरण है. वह न जाने कितने युवा रचनाकारों के प्रेरणा स्रोत रहे. उनसे जुड़ी अनेक यादें मन मस्तिष्क में घुमड़ रही हैं. साहित्य प्रेमी मंडल परिवार की ओर से विनम्र श्रद्धांजलि.”






