वाराणसी – आश्विन कृष्ण पक्ष की प्रतिपदा से अमावस्या तिथि तक पूर्वजों की आत्मशांति के लिए विधि-विधान पूर्वक श्राद्ध करने की परंपरा है. आश्विन मास की अमावस्या आज है. आज के दिन सर्व पितृ विसर्जन करने का विधान है. आज किए गए श्राद्ध से पितृगण प्रसन्न होकर जीवन में सुख-सौभाग्य व खुशहाली का आशीर्वाद देते हैं. ज्योतिषविद विमल जैन ने बताया कि सनातन धर्म में हिन्दू मान्यता के अनुसार मुख्य रूप से 5 ऋण माने गए हैं. प्रथम-देवऋण, द्वितीय-ऋषिऋण, तृतीय-पितृऋण, चतुर्थ-मातृऋण, पंचम मानवऋण. इन ऋणों से मुक्ति पाने के लिए समय-समय पर विधि-विधानपूर्वक धार्मिक अनुष्ठान करते रहना चाहिए.
पौराणिक मान्यता के आधार पर मंत्र, स्तोत्र एवं पितृ सूक्त का रोज पाठ करने से पितृ बाधा समाप्त हो जाता है. यदि रोज पढ़ना मुमकिन न हो तो प्रत्येक माह की अमावस्या तिथि के दिन अवश्य करना चाहिए. साथ ही अमावस्या के दिन अपने पूर्वजों के नाम पर श्वेत वस्त्र, दूध, चीनी, दक्षिणा किसी योग्य ब्राह्मण या किसी नजदीक के मंदिर में दान कर देना चाहिए. वहीं, 21 सितंबर को पितृ अमावस्या के दिन सूर्य ग्रहण भी लग रहा है. पितृपक्ष की शुरुआत भी चंद्र ग्रहण के साथ हुई थी. हालांकि, इस सूर्य ग्रहण का भारत में कोई असर नहीं होगा. यह ग्रहण रात्रि 10:59 से शुरू होगा और 22 सितंबर सुबह 3:23 पर खत्म होगा.

तत्पश्चात् उत्तराफाल्गुनी नक्षत्र सम्पूर्ण दिन रहेगा. इस दिन शुभयोग रात्रि 7 बजकर 53 मिनट तक रहेगा. महालया की समाप्ति रविवार को हो जाएगी. अमावस्या के दिन अज्ञात तिथि (जिन परिजनों की मृत्यु तिथि मालूम न हो या जिन्होंने किसी कारणवश अपने पितरों का श्राद्ध न किया हो) वालों का श्राद्ध रविवार को विधि-विधानपूर्वक किया जाएगा. पितृपक्ष में किसी कारणवश माता-पिता, दादा-दादी एवं अन्य परिजनों का श्राद्ध न कर पाए हों, उन्हें अमावस्या तिथि पर श्राद्ध करके पितृऋण से मुक्ति पानी चाहिए. अमावस्या तिथि के दिन श्राद्ध करने से अपने कुल व परिवार के सभी पितरों का श्राद्ध मान लिया जाता है.
ज्योतिष विमल जैन ने बताया कि त्रिपिंडी में तीन पूर्वज-पिता, दादा और परदादा को तीन देवताओं का स्वरूप माना गया है. पिता को वसु, दादा को रुद्र देवता तथा परदादा को आदित्य देवता के रूप में माना जाता है. श्राद्ध के समय यही तीन स्वरूप अन्य सभी पूर्वजों के प्रतिनिधि माने गए हैं.
श्राद्ध कर्म का विधान
ज्योतिर्विद विमल जैन ने बताया कि श्राद्धकर्म में 1, 3, 5 या 16 योग्य ब्राह्मणों को अमावस्या तिथि पर आमंत्रित करके उन्हें स्वच्छतापूर्वक भोजन कराने की धार्मिक मान्यता है. जिसमें दूध व चावल से बने खीर अति आवश्यक है. इसके अतिरिक्त दिवंगत परिजनों, जिनका हम श्राद्ध करते हैं, उनके पसंद का सात्विक भोजन ब्राह्मण को कराना चाहिए. ब्राहाण को भोजन कराने के पूर्व देवता, गाय, कुत्ता, कौआ व चीटी के लिए श्राद्ध के बने भोजन को पत्ते पर निकाल देना चाहिए. जिसे पंचबलि कर्म कहते हैं.
भोजन गाय को खिलाने के पश्चात् निमंत्रित ब्राह्मण को भोजन करवाना चाहिए. श्राद्ध में लोहे का बर्तन इस्तेमाल नहीं करना चाहिए. मान्यता है कि श्राद्ध अपने ही घर पर अथवा नदी या गंगा तट पर करना चाहिए. दूसरों के घर पर किया गया श्राद्ध फलदायी नहीं होता.
भोजन में क्या न करें प्रयोग
भोजन की वस्तुओं में अरहर, उड़द, मसूर, कद्दू (गोल लौकी), बैंगन, गाजर, शलजम, सिंघाड़ा, जामुन, अलसी, चना, काला नमक, हींग आदि का भी इस्तेमाल नहीं करना चाहिए. लहसुन, प्याज रहित शुद्ध, सात्विक एवं शाकाहारी भोजन बनाया जाता है.
भोजन में मिठाई का होना अति आवश्यक है. ब्राहाण को भोजन करवाने के बाद उन्हें यथासामर्थ्य अन्न, वख, नवीन पात्र, गुड़, नमक, देशी घी, सोना, चांदी, तिल व नकद द्रव्य आदि दक्षिणा के साथ देकर आशीर्वाद लेना चाहिए. जो किसी कारणवश श्राद्ध न करा पाएं, तो ब्राहाण को भोजन के प्रयोग में आने वाली समस्त सामग्री जैसे आटा, दाल, चावल, शुद्ध देशी घी, चीनी, गुड़, नमक, हरी सब्जी, फल, मिष्ठान आदि अन्य उपयोगी वस्तुओं के साथ वस्त्र व नकद द्रव्य देकर उनसे आशीर्वाद लेना चाहिए. जिससे पितरों को सन्तुष्टि मिलती है, जो भी व्यक्ति पितरों के नाम से ब्राह्मण भोजन करवाते हैं, पितर उन्हें सूक्ष्म रूप से ग्रहण कर लेते हैं.
मुख्य द्वार पर जलाया जाता है दीपक
ज्योतिषविद विमल जैन ने बताया कि सायंकाल मुख्य द्वार पर भोज्य सामग्री रखकर दीपक जलाया जाता है. जिससे पितृगण तृप्त व प्रसन्न रहें और उन्हें जाते समय प्रकाश मिले. श्राद्ध अपने द्वारा उपार्जित धन से किया जाना फलदायी होता है, जो व्यक्ति विधि-विधिपूर्वक श्राद्ध करने में असमर्थ हो. उन्हें चाहिए सुबह स्नानादि के पश्चात् काले तिलयुक्त जल से दक्षिण दिशा की ओर मुख करके तिलांजलि देकर अपने पितरों को याद करके उनके प्रति श्रद्धा व्यक्त करनी चाहिए तथा अपने दोनों हाथ ऊपर उठाकर सूर्यादि दिक्पालों से यह कहकर कि मेरे पास धन, शक्ति एवं अन्य वस्तुओं का अभाव है. जिसके फलस्वरूप में श्राद्ध कर्म नहीं कर पा रहा हूं. हाथ जोड़कर श्रद्धा के साथ पितृगणों को प्रणाम करना भी पितरों की सन्तुष्टि मानी गई है.
उन्होंने बताया कि घर का मुख्य द्वार तो हमेशा बाहर सड़क या खुले में होना चाहिए. ऐसे में दीपक जलाने के लिए अपने अपार्टमेंट के मुख्य द्वार का ही इस्तेमाल करें. फ्लैट के बाहर दीपक ना जलाएं, क्योंकि वह खुला एरिया नहीं होता. जब पितृ विदा होते हैं तो वह आपके मुख्य द्वार से निकलेंगे.






