छत्तीसगढ़ में शराब घोटाले की जांच ने नया मोड़ ले लिया है. प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) ने शुक्रवार को पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल के बेटे चैतन्य बघेल को गिरफ्तार कर लिया. ईडी का आरोप है कि घोटाले के दौरान नकली होलोग्राम और फर्जी शराब स्टॉक के जरिए करोड़ों रुपये की अवैध कमाई हुई, जिसमें नेताओं और अफसरों की मिलीभगत थी.
भिलाई/ रायपुर – छत्तीसगढ़ में शराब घोटाले की तपिश अब पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल के परिवार तक पहुंच गई है. प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) ने शुक्रवार को उनके बेटे चैतन्य बघेल को गिरफ्तार कर लिया, जिससे राज्य की राजनीति में एक बार फिर उबाल आ गया है. बेटे चैतन्य बघेल को 5 दिन की रिमांड पर लिया गया है. ईडी की जांच के अनुसार, यह घोटाला 2019 से 2022 के बीच चला. आरोप है कि सरकारी शराब दुकानों के जरिए नकली होलोग्राम, डुप्लिकेट बोतलों और फर्जी स्टॉक के माध्यम से करीब 2174 करोड़ रुपये की अवैध शराब बेची गई. इस काम को अंजाम देने के लिए एक सिंडिकेट सक्रिय था, जिसमें नेता, अफसर और कारोबारी शामिल थे.
शराब की बोतलों पर लगाए जाने वाले होलोग्राम का टेंडर नोएडा की एक अयोग्य कंपनी को दे दिया गया, जो कथित तौर पर एक प्रभावशाली अफसर से जुड़ी थी. इस कंपनी ने नकली होलोग्राम बनाए, जिन्हें CSMCL के जरिए ठेकों तक भेजा गया. इसके जरिए तीन साल में लगभग 60 लाख पेटियां शराब की अवैध रूप से बिक्री हुई. इस मामले में कांग्रेस नेता और रायपुर मेयर एजाज ढेबर के भाई अनवर ढेबर, आईएएस अनिल टुटेजा और अफसर अरुणपति त्रिपाठी पहले ही गिरफ्तार हो चुके हैं. अब ईडी का कहना है कि चैतन्य बघेल इन लेन-देन से जुड़े वित्तीय ट्रांजेक्शन और संपत्ति निवेश में शामिल रहे हैं.
पूर्व मंत्री कवासी लखमा पर भी लगे थे आरोप
पूर्व आबकारी मंत्री कवासी लखमा पर भी हर महीने 2 करोड़ रुपये की रिश्वत लेने का आरोप है, और उनके बेटे हरीश लखमा के पास से मिले डिजिटल साक्ष्यों की जांच चल रही है. चैतन्य की गिरफ्तारी के बाद कांग्रेस ने इसे राजनीतिक साजिश बताया है, जबकि भाजपा ने कहा है कि बघेल सरकार के कार्यकाल में हुए भ्रष्टाचार की परतें अब खुल रही हैं. आगामी चुनावों के पहले यह मामला राजनीति में आ गया है.
छत्तीसगढ़ शराब घोटाले में 2174 करोड़ की अवैध कमाई का आरोप
छत्तीसगढ़ में सामने आया शराब घोटाला फरवरी 2019 में शुरू हुआ बताया जा रहा है. जांच एजेंसियों के मुताबिक, शुरुआत में डिस्टिलरी से हर महीने 800 पेटियों की सप्लाई कर 200 ट्रक भेजे जाते थे. उस समय शराब की एक पेटी की कीमत 2,840 रुपये तय की गई थी. धीरे-धीरे इस ऑपरेशन का दायरा बढ़ता गया और सप्लाई को दोगुना कर दिया गया. महीने में अब 400 ट्रकों के जरिए अवैध रूप से शराब की डिलीवरी की जाने लगी. इसके साथ ही एक पेटी की कीमत भी बढ़ाकर 3,880 रुपये कर दी गई. प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) की जांच में सामने आया कि तीन वर्षों में करीब 60 लाख पेटी शराब अवैध रूप से बेची गई. इससे कथित तौर पर 2,174.60 करोड़ रुपये का अवैध मुनाफा कमाया गया. इस पूरे सिंडिकेट में नेताओं, अधिकारियों और कारोबारियों की मिलीभगत के आरोप लगे हैं.






