श्रीनगर – जम्मू कश्मीर और लद्दाख हाई कोर्ट ने बुधवार को पहलगाम हमले के बाद निर्वासित 63 वर्षीय पाकिस्तानी मूल की महिला को वापस भेजने के आदेश पर रोक लगा दी है. उसे पिछले महीने निर्वासित किया गया था.
चीफ जस्टिस अरुण पाली और जस्टिस राजेश ओसवाल की खंडपीठ ने सिंगल बेंच के उस आदेश पर अंतरिम रोक लगाई, जिसमें जम्मू के निवासी से विवाहित पाकिस्तानी नागरिक रक्षंदा राशिद को वापस भेजने का निर्देश दिया गया था. अदालत ने केंद्र शासित प्रदेश प्रशासन और गृह मंत्रालय द्वारा दायर लेटर्स पेटेंट अपील (एलपीए) को भी स्वीकार कर लिया, जिसमें 6 जून के पहले के फैसले को चुनौती दी गई थी.
रक्षंदा राशिद, जो दीर्घकालिक वीजा (एलटीवी) पर थीं. वह कथित तौर पर कई स्वास्थ्य समस्याओं से ग्रस्त थीं. पहलगाम में हुए आतंकी हमले के बाद उन्हें पिछले महीने वापस भेज दिया गया था. यह निर्धारित अवधि से अधिक समय तक रहने वाले विदेशी नागरिकों के खिलाफ व्यापक कार्रवाई का हिस्सा था. पहलगाम आतंकी हमले में पर्यटकों सहित 26 लोगों की मौत हो गई थी.
जस्टिस राहुल भारती के पारित मूल आदेश में केंद्र सरकार को राशिद की वापसी को 10 दिनों के भीतर सुगम बनाने का निर्देश दिया गया था, जिसमें पारिवारिक जीवन के उसके अधिकार का हवाला दिया गया था. न्यायाधीश ने इस बात पर जोर दिया था कि, मानव अधिकार मानव जीवन का सबसे पवित्र अंग है. उन्होंने यह भी कहा कि, रक्षंदा के निर्वासन ने उसे जम्मू में रहने वाले भारतीय नागरिक, अपने पति शेख जहूर अहमद से अलग कर दिया.
रक्षंदा राशिद का जन्म पाकिस्तान में हुआ. वह 38 साल से जम्मू कश्मीर में रह रही हैं. रक्षंदा के दो बच्चे हैं. उनके पति का नाम शेख जहूर अहमद है. पत्नी लॉन्ग टर्म वीजा (LTV) के तहत भारत में रह रही थी. उन्हें पाकिस्तान भेजा गया था. उनके दोनों बच्चे और पति भारत में ही हैं.
मामले की पृष्ठभूमि जस्टिस राहुल भारती ने 6 जून के अपने आदेश में मामले से जुड़े तथ्यों और परिस्थितियों की असाधारण नेचर पर ध्यान दिया था. इसमें कहा गया कि, 38 सालों से भारत में रह रही रक्षंदा राशिद की शादी एक भारतीय नागरिक से हुई थी. वह दीर्घकालिक वीजा पर थी. वीजा का हर साल रिन्यूअल होता था. रक्षंदा ने 1996 में भारतीय नागरिकता के लिए भी आवेदन किया था, जो निर्वासन के समय भी लंबित था.






