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‘सुशासन’ वाले बिहार में ये हो क्या रहा है? अपराध, शराबबंदी और फैसलों पर उठते सवाल

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पटना. बिहार की राजनीति में ‘सुशासन’ और कानून का राज लंबे समय से बड़ा मुद्दा रहा है. सरकार अपराधियों पर सख्ती और तेज कार्रवाई का दावा करती है, लेकिन पिछले कुछ दिनों में सामने आई घटनाओं की एक श्रृंखला ने फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि आखिर जमीन पर क्या हो रहा है? जमुई में नाबालिग लड़की के साथ सड़क पर बदसलूकी का वीडियो वायरल हुआ तो कुछ ही दिनों बाद समस्तीपुर में भी लड़की से अभद्रता का वीडियो सामने आया. मुजफ्फरपुर में छात्राओं पर हमले की घटनाएं हुईं और पटना में वार्ड पार्षद के पति को गोलियां मार दी गईं. इन घटनाओं के बीच शराबबंदी, अपराधियों के मनोबल, सरकार के फैसलों में बदलाव और सत्ता पक्ष के भीतर से उठती आवाजें भी चर्चा में हैं.
सवाल सिर्फ यह नहीं है कि अपराध हुआ या नहीं. सवाल यह भी है कि क्या पुलिस-प्रशासन का खौफ अपराधियों में उतना है, जितना सरकार दावा करती है? और अगर कार्रवाई हो भी रही है तो क्या वह अपराध होने से पहले लोगों में सुरक्षा का भरोसा पैदा करने के लिए पर्याप्त है?
जमुई से समस्तीपुर तक… सवालों की एक कड़ी
19 सितंबर को जमुई में एक नाबालिग लड़की और उसके पुरुष मित्र को युवकों के एक समूह ने कथित तौर पर रास्ते में रोककर उनके साथ बदसलूकी की. घटना के वीडियो सोशल मीडिया पर सामने आने के बाद मामला तेजी से चर्चा में आया. पुलिस ने एफआईआर दर्ज की और कई आरोपियों को पकड़ा. मुख्य आरोपी नंदन यादव को पुलिस ने मुठभेड़ के दौरान पैर में गोली लगने के बाद गिरफ्तार करने की बात कही.
इस मामले ने इसलिए भी बड़ा सवाल खड़ा किया क्योंकि घटना का वीडियो बनाने और उसे सोशल मीडिया पर डालने की वजह से मामला सामने आया. यानी सवाल यह भी है कि अगर वीडियो सामने नहीं आता तो क्या पुलिस तक घटना उसी तेजी से पहुंचती? यह एक ऐसा सवाल है जिसका जवाब केवल गिरफ्तारी से नहीं, बल्कि पुलिस की स्थानीय निगरानी और अपराध रोकने की व्यवस्था से जुड़ा है.
जमुई की घटना की चर्चा अभी थमी भी नहीं थी कि 24 सितंबर को समस्तीपुर से भी एक ऐसा ही मामला सामने आया. पुलिस के मुताबिक, एक लड़की के साथ कुछ युवकों ने कथित तौर पर अभद्र व्यवहार किया और उसका वीडियो भी सामने आया. पुलिस ने चार आरोपियों को गिरफ्तार करने की जानकारी दी है.
मुजफ्फरपुर में भी सामने आईं घटनाएं
मुजफ्फरपुर में भी हाल के दिनों में लड़कियों और महिलाओं की सुरक्षा को लेकर चिंता बढ़ाने वाली घटनाएं सामने आई हैं. एक मामले में स्कूल जा रही दो छात्राओं पर बाइक सवार युवक ने ब्लेड से हमला किया. दूसरे मामले में पुलिस भर्ती की तैयारी कर रही 22 वर्षीय महिला ने एक युवक पर पीछा करने, धमकी देने और चाकू से हमला करने का आरोप लगाया. पुलिस ने एफआईआर दर्ज कर कार्रवाई शुरू करने की बात कही है. अलग-अलग घटनाओं को जोड़कर यह कहना सही नहीं होगा कि हर मामले के पीछे एक ही कारण है. लेकिन एक साथ सामने आ रही ऐसी घटनाएं सार्वजनिक सुरक्षा और पुलिस की मौजूदगी पर सवाल जरूर खड़े करती हैं.
पटना में पार्षद पति को पांच गोलियां
राजधानी पटना में 23 सितंबर को बुद्धा कॉलोनी थाना क्षेत्र में वार्ड पार्षद के पति अनिल यादव पर गोलीबारी हुई. रिपोर्ट के मुताबिक उन्हें पांच गोलियां लगीं और गंभीर हालत में अस्पताल ले जाया गया. घटना के सीसीटीवी फुटेज में तीन हमलावरों के पहुंचने और फायरिंग करने की बात सामने आई है. बाद में घायल को मेदांता अस्पताल रेफर किया गया. यह घटना इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि पटना को राज्य की प्रशासनिक और राजनीतिक राजधानी माना जाता है. राजधानी में दिनदहाड़े इस तरह की गोलीबारी का असर केवल एक आपराधिक केस तक सीमित नहीं रहता. यह शहर में कानून-व्यवस्था और सुरक्षा की धारणा को भी प्रभावित करता है.
मुख्यमंत्री का भरोसा बनाम जमीन की तस्वीर
मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी लगातार अपराध के खिलाफ सख्त कार्रवाई की बात कर रहे हैं. जमुई मामले पर उन्होंने कहा कि अपराधी पुलिस को चुनौती देगा तो 24 घंटे के भीतर जवाब मिलेगा. उन्होंने यह भी कहा कि अपराधी की कोई जाति नहीं होती और पुलिस अपराधियों के खिलाफ कार्रवाई करेगी. यह सरकार के स्तर पर सख्त संदेश है. लेकिन शासन की असली परीक्षा केवल अपराधी की गिरफ्तारी के बाद नहीं होती. असली सवाल यह है कि क्या आम आदमी को घटना से पहले ही यह भरोसा है कि उसके साथ कुछ गलत होगा तो पुलिस समय पर पहुंचेगी?
शराबबंदी… फिर भी शराब का कारोबार क्यों?
बिहार में शराबबंदी सरकार की सबसे चर्चित नीतियों में से एक है. मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी ने हाल ही में साफ कहा कि सरकार शराबबंदी जारी रखेगी. उन्होंने यह भी स्वीकार किया कि शराबबंदी से राज्य को करीब 20 हजार करोड़ रुपये के राजस्व का नुकसान होता है, लेकिन इसे महिलाओं के सम्मान और हित से जुड़ा फैसला बताया. साथ ही उन्होंने जहरीली शराब को चिंता का विषय माना. लेकिन, दूसरी तरफ शराब की अवैध तस्करी और बिक्री से जुड़े मामले लगातार सामने आते हैं. यहीं से एक बड़ा नीतिगत सवाल पैदा होता है- अगर शराब कानूनी तौर पर प्रतिबंधित है, तो अवैध शराब का नेटवर्क कैसे चलता रहता है?
शराबबंदी और अपराध के बीच सीधा कारण-परिणाम संबंध स्थापित करना अलग विषय है. लेकिन अवैध शराब के कारोबार के साथ अपराध, तस्करी और स्थानीय स्तर पर प्रभावशाली नेटवर्क की शिकायतें सामने आना सरकार के लिए निश्चित तौर पर कानून लागू करने की चुनौती है. यानी शराबबंदी पर बहस केवल ‘शराब रहे या नहीं रहे’ तक सीमित नहीं है. सवाल यह भी है कि प्रतिबंध के बावजूद बनने वाले अवैध बाजार को खत्म करने के लिए पुलिस, प्रशासन और आबकारी तंत्र कितना प्रभावी है.
फैसले हुए, फिर बदले… क्या नीति में जल्दबाजी?
सम्राट चौधरी सरकार के शुरुआती महीनों में कुछ फैसलों को लेकर भी सरकार को पीछे हटना पड़ा है. सबसे चर्चित उदाहरण बिहार स्टूडेंट क्रेडिट कार्ड योजना है. सरकार ने शिक्षा ऋण की अधिकतम सीमा चार लाख रुपये से घटाकर दो लाख रुपये की थी, लेकिन करीब 10 दिनों के भीतर पुरानी चार लाख रुपये की सीमा बहाल कर दी गई. TRE-4 की परीक्षा व्यवस्था, कुछ शहरी विकास संबंधी फैसलों और टोल जैसे मुद्दों पर भी फैसलों में बदलाव को लेकर रिपोर्टें सामने आई हैं.
रमा देवी का वायरल ऑडियो और अंदर की बेचैनी
इन सबके बीच बीजेपी की पूर्व सांसद रमा देवी के नाम से एक कथित ऑडियो वायरल हुआ है. इसमें टिकट, पैसे और विकास कार्यों में भ्रष्टाचार को लेकर गंभीर बातें कही गई हैं. रमा देवी ने बाद में इस मुद्दे पर अपनी परेशानी की बात कही, हालांकि वायरल ऑडियो की स्वतंत्र पुष्टि और उसका पूरा संदर्भ स्पष्ट नहीं है. इसलिए इसे प्रमाणित बयान के तौर पर नहीं देखा जा सकता. फिर भी इस तरह का ऑडियो सत्ता पक्ष के भीतर की बेचैनी की चर्चा को जन्म देता है. खासकर तब, जब सरकार के कुछ फैसलों को लेकर सियासी और सामाजिक विरोध पहले ही सामने आ चुका हो. यहां भी सवाल ऑडियो के सही या गलत होने से आगे जाता है- क्या सत्ता और संगठन के बीच संवाद पर्याप्त है? क्या स्थानीय नेताओं और जनप्रतिनिधियों की शिकायतें समय रहते सुनी जा रही हैं?
बिहार की छवि पर असर
बिहार की छवि को लेकर सबसे बड़ा नुकसान तब होता है जब अपराध की घटनाएं केवल स्थानीय अखबार की खबर नहीं रहतीं, बल्कि उनके वीडियो राष्ट्रीय स्तर पर वायरल होने लगते हैं. जमुई की घटना इसका उदाहरण है. उसके बाद समस्तीपुर की घटना का वीडियो सामने आना इस बहस को और बड़ा करता है. बिहार की छवि केवल सरकार की योजनाओं, सड़कों, पुलों और निवेश प्रस्तावों से नहीं बनती. यह भी देखा जाता है कि सड़क पर एक आम लड़की कितनी सुरक्षित है, रात में कोई परिवार कितना निश्चिंत होकर निकल सकता है और अपराध के बाद पुलिस कितनी तेजी से कार्रवाई करती है. इसी तरह विकास योजनाओं की घोषणा और उनका जमीन पर असर भी छवि का हिस्सा है. अगर किसी योजना की घोषणा हो, फिर उसका स्वरूप बदले या फैसला वापस हो जाए, तो लोगों के मन में नीति की स्थिरता को लेकर सवाल उठना स्वाभाविक है.
‘सुशासन’ की असली परीक्षा यहीं है
सम्राट चौधरी सरकार के सामने तस्वीर का दूसरा पहलू भी है. सरकार ने अपराध के कई मामलों में कार्रवाई की है, आरोपियों की गिरफ्तारी हुई है और मुख्यमंत्री लगातार पुलिस को सख्त कार्रवाई का निर्देश देने की बात कर रहे हैं. सरकार विकास, रोजगार और बुनियादी ढांचे को लेकर भी बड़ा रोडमैप पेश कर रही है. मुख्यमंत्री ने हाल में 150 दिनों का रिपोर्ट कार्ड पेश करते हुए शिक्षा, रोजगार, उद्योग और इंफ्रास्ट्रक्चर को लेकर कई दावे किए. लेकिन ‘सुशासन’ का पैमाना केवल घोषणाओं या कार्रवाई की संख्या नहीं हो सकता. इसका सबसे बड़ा पैमाना जनता का भरोसा है.
अगर अपराधी घटना को अंजाम देने से पहले पुलिस से नहीं डरता, अगर लड़कियों को सड़क पर सुरक्षा का भरोसा नहीं रहता, अगर राजधानी में खुलेआम गोली चलती है, अगर शराबबंदी के बावजूद अवैध शराब का नेटवर्क कायम रहता है और अगर नीतियों को बार-बार बदलना पड़ता है, तो सरकार को इन सभी सवालों का जवाब देना होगा. क्योंकि सुशासन का मतलब सिर्फ अपराधी को पकड़ना नहीं, अपराध होने से पहले उसका डर खत्म करना भी है. फिलहाल बिहार में घटनाओं की यह श्रृंखला एक बड़ा सवाल छोड़ रही है- सरकार का दावा मजबूत है, लेकिन क्या जमीन पर भी आम आदमी को वही भरोसा महसूस हो रहा है? यही ‘सुशासन’ की सबसे बड़ी परीक्षा है.