टाटा ट्रस्ट के सामने 37 साल पुराना एक विवाद फिर से आकर खड़ा हो गया है. वैसे तो यह मामला महज 833 शेयरों से जुड़ा है, लेकिन कुछ लोगों ने इसे मुद्दा बनाकर टाटा ट्रस्ट को लीगल नोटिस भेज दिया है. वैसे तो ट्रस्ट ने इन सभी आरोपों को बेबुनियाद बताया है, लेकिन सवाल यह है कि आखिर अनियमितता का आरोप लगाने की वजह क्या रही है.
नई दिल्ली – दिवंगत रतन टाटा के जाने के बाद से ही विवादों ने टाटा समूह का पीछा करना शुरू कर दिया है. कभी ट्रस्ट में नियुक्ति को लेकर विवाद तो कभी टाटा संस के शेयर बाजार में लिस्ट होने पर विवाद. अब टाटा ट्रस्ट पर 100 साल की विरासत में पहली बार शेयरों के गलत तरीके से ट्रांसफर को लेकर आरोप लगाए गए हैं. वैसे तो टाटा ट्रस्ट ने इन सभी आरोपों से इनकार किया है और आरोप लगाने वाले पर कानूनी कार्रवाई की भी बात कही है, लेकिन सवाल यह है कि आखिर इतने पुराने मामले को अब उठाया क्यों जा रहा और क्या इस पूरे मामले में कोई ऐसा लूपहोल है, जो टाटा समूह की 100 साल की विरासत पर अगुंली उठाने लायक बनाता है.
दरअसल, इस मामले की शुरुआत साल 1989 में हुई थी. तब नवाजबाई रतन टाटा ट्रस्ट (NRTT) ने नवल एच टाटा को समूह की होल्डिंग कंपनी टाटा संस के 833 शेयर ट्रांसफर किए थे. अब रतन टाटा के निधन के बाद ट्रस्ट में चल रहे आंतरिक विवादों के बीच इस मामले ने एक बार फिर से सिर उठाया है. आरोप लगाने वाले ने इस ट्रांसफर को अनियमितता बताते हुए चुनौती दी है. हालांकि, टाटा ट्रस्ट ने इन सभी आरोपों को बेबुनियाद बताया है और कहा है कि शेयरों के ट्रांसफर तत्कालीन नियमों के तहत किए गए थे. यह सिर्फ ट्रस्ट को बदनाम करने की साजिश है.
क्या है इस पूरे मामले की जड़
नवाजभाई रतन टाटा ट्रस्ट एक पब्लिक चैरिटेबल ट्रस्ट था, जिसकी स्थापना साल 1974 में की गई थी. शुरुआम में इसके ट्रस्टी दिवंगत रतन टाटा और प्रसिद्ध वकील नानी एक पालखीवाला थे. इस ट्रस्ट को साल 1974 में सर रतन टाटा ट्रस्ट से टाटा संस के कुछ शेयर दान में मिले थे. साल 1979 में बोनस इश्यू के बाद यह संख्या बढ़कर 833 हो गई. इसके बाद 18 जनवरी, 1989 में रतन टाटा और नोएल टाटा के पिता नवल एच टाटा को यह सभी 833 शेयर उनके व्यक्तिगत नाम से ट्रांसफर कर दिए गए.
नवाजभाई रतन टाटा ट्रस्ट एक पब्लिक चैरिटेबल ट्रस्ट था, जिसकी स्थापना साल 1974 में की गई थी. शुरुआम में इसके ट्रस्टी दिवंगत रतन टाटा और प्रसिद्ध वकील नानी एक पालखीवाला थे. इस ट्रस्ट को साल 1974 में सर रतन टाटा ट्रस्ट से टाटा संस के कुछ शेयर दान में मिले थे. साल 1979 में बोनस इश्यू के बाद यह संख्या बढ़कर 833 हो गई. इसके बाद 18 जनवरी, 1989 में रतन टाटा और नोएल टाटा के पिता नवल एच टाटा को यह सभी 833 शेयर उनके व्यक्तिगत नाम से ट्रांसफर कर दिए गए.
फिर इसमें झोल क्या है
अभी तक तो यही लग रहा कि शेयर एक नाम से दूसरे नाम पर ट्रांसफर किए गए, लेकिन आरोपों की असली जड़ ये है कि इन शेयरों के मूल्य को शून्य दिखाया गया था. उससे भी बड़ी बात ये है कि शेयरों के ट्रांसफर के ठीक एक सप्ताह पहले यानी 11 जनवरी, 1989 को नवल टाटा ने ट्रस्ट के ट्रस्टी पद से इस्तीफा दे दिया था. बस यहीं से सारा विवाद शुरू हुआ और शिकायतकर्ता सूरेश पटिलखेड़े व सुनील तुलसीराम पटिलखेड़े ने महाराष्ट्र चैरिटी कमिश्नर को शिकायत भेजी.
अभी तक तो यही लग रहा कि शेयर एक नाम से दूसरे नाम पर ट्रांसफर किए गए, लेकिन आरोपों की असली जड़ ये है कि इन शेयरों के मूल्य को शून्य दिखाया गया था. उससे भी बड़ी बात ये है कि शेयरों के ट्रांसफर के ठीक एक सप्ताह पहले यानी 11 जनवरी, 1989 को नवल टाटा ने ट्रस्ट के ट्रस्टी पद से इस्तीफा दे दिया था. बस यहीं से सारा विवाद शुरू हुआ और शिकायतकर्ता सूरेश पटिलखेड़े व सुनील तुलसीराम पटिलखेड़े ने महाराष्ट्र चैरिटी कमिश्नर को शिकायत भेजी.
ट्रस्ट पर क्या लगे आरोप
- ट्रस्टी अप्रूवल की कमी : ट्रांसफर के लिए कोई ट्रस्टी रिजोल्यूशन नहीं था. ट्रस्ट की संपत्ति बिना उचित अनुमति के ट्रांसफर की गई.
- कीमत शून्य दिखाना : ट्रांसफर किए गए शेयरों के मूल्य शून्य दिखाए गए, जबकि 1989 में प्रत्येक शेयर की अनुमानित कीमत 90,000 रुपये से लेकर 1,00,000 रुपये के आसपास थी. इस लिहाज से 833 शेयरों का मूल्य काफी बड़ा होगा. इससे चैरिटेबल ट्रस्ट की संपत्ति को नुकसान पहुंचाया गया.
- ट्रस्टी का इस्तीफा : शेयरों का ट्रांसफर तब किया गया, जबकि नवल टाटा ट्रस्टी पद से इस्तीफा दे चुके थे. यह ट्रांसफर ट्रस्ट की संपत्ति को व्यक्तिगत फायदा पहुंचाने जैसा था.
- डॉक्यूमेंट की कमी : इस ट्रांसफर में कंपनी एक्ट 1956 और टाटा संस के आर्टिकल्स ऑफ एसोसिएशन का पालन नहीं किया गया, जिसमें डॉक्यूमेंट्स की भी कमी रही.
ट्रांसफर के उद्देश्यों का उल्लंघन : आरोप है कि ट्रस्ट की संपत्ति चैरिटी की होती है, न कि परिवार सदस्यों को व्यक्तिगत रूप से इस्तेमाल करने के लिए. - परिवार का अधिकार : नवल टाटा के निधन के बाद यह शेयर उनके वारिसों जैसे रतन टाटा, जिमी टाटा और नोएल टाटा को ट्रांसफर हो गए, जिस पर परिवार का अधिकार हो गया.
क्या है शिकायतकर्ता की डिमांड
शिकायतकर्ता ने ट्रस्ट को हुए नुकसान की भरपाई के लिए जांच और उत्तराधिकारियों पर जिम्मेदारी तय करने की मांग की है. शिकायतकर्ता ने यह आरोप 8 जून को हुई सर दोराबजी टाटा ट्रस्ट की बैठक से ठीक पहले ही दायर किया था. हालांकि, ट्रस्ट ने साफ कहा है कि आरोप बेबुनियाद हैं और शेयर ट्रांसफर से पहले सभी कानूनी पहलुओं और नियमों का पालन किया गया था. इसके लिए उचित अप्रूवल और नानी ए पालखीवाला जैसे विशेषज्ञों से भी अनुमति ली गई थी. इसके लिए टाटा संस के बोर्ड ने भी मंजूरी दी थी. लिहाजा ट्रस्ट लीगल एक्शन लेने की तैयारी में है.
शिकायतकर्ता ने ट्रस्ट को हुए नुकसान की भरपाई के लिए जांच और उत्तराधिकारियों पर जिम्मेदारी तय करने की मांग की है. शिकायतकर्ता ने यह आरोप 8 जून को हुई सर दोराबजी टाटा ट्रस्ट की बैठक से ठीक पहले ही दायर किया था. हालांकि, ट्रस्ट ने साफ कहा है कि आरोप बेबुनियाद हैं और शेयर ट्रांसफर से पहले सभी कानूनी पहलुओं और नियमों का पालन किया गया था. इसके लिए उचित अप्रूवल और नानी ए पालखीवाला जैसे विशेषज्ञों से भी अनुमति ली गई थी. इसके लिए टाटा संस के बोर्ड ने भी मंजूरी दी थी. लिहाजा ट्रस्ट लीगल एक्शन लेने की तैयारी में है.



