सुप्रीम कोर्ट की जज जस्टिस बीवी नागरत्ना ने देश की न्याय प्रणाली में हो रही देरी, बढ़ते खर्चों और मुकदमों के बोझ पर चिंता जताई है। उन्होंने वकीलों से वकालत को व्यापार बनाने के बजाय जनसेवा की तरह अपनाने और अपनी कार्यशैली में सुधार करने का आह्वान किया है। उन्होंने क्या-क्या कहा? जानिए…
नई दिल्ली – देश की राजधानी नई दिल्ली में नेशनल लॉ यूनिवर्सिटी के 13वें दीक्षांत समारोह के दौरान सुप्रीम कोर्ट की वरिष्ठ जज वीवी नागरत्ना ने एक बड़ा और गंभीर मुद्दा उठाया। उन्होंने कहा कि हमारी अदालतें मुकदमों के अंबार, लगातार होती देरी और वकीलों की भारी-भरकम फीस से कराह रही हैं। ऐसे में अब समय आ गया है कि देश का वकीलों का समुदाय (बार) अपने रवैये में सुधार करे, अपने कामकाज पर विचार करे और एक सुर में न्याय व्यवस्था को संभालने के लिए आगे आए।
वकीलों से अपील करते हुए जस्टिस नागरत्ना ने कहा कि वे अपनी सोच बदलें। वकालत को सिर्फ पैसा कमाने का जरिया बनाने के बजाय इसे जनता की सेवा के रूप में देखें। अगर वकील ऐसा नहीं करेंगे, तो आने वाले समय में आम जनता के बीच उनकी अहमियत खत्म हो जाएगी। उन्होंने वकीलों को लोकतंत्र का ‘सेफ्टी वाल्व’ बताया। उनका कहना था कि वकीलों को मिली आजादी किसी व्यक्तिगत फायदे के लिए नहीं है, बल्कि इसलिए है ताकि वे बिना किसी सरकार, बाजार या ग्राहक के दबाव के सच के लिए खड़े हो सकें।
आज की नई तकनीक पर बात करते हुए जस्टिस नागरत्ना ने युवा वकीलों को सावधान किया। उन्होंने कहा कि कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) चाहे कितना भी आगे बढ़ जाए, इंसानी समझ और सूझबूझ का मुकाबला नहीं कर सकता। उन्होंने वकीलों को सख्त चेतावनी दी कि वे एआई द्वारा दिए गए फर्जी या मनगढ़ंत अदालती फैसलों (हैलुसिनेशन) के बहकावे में न आएं और कोर्ट में गलत तथ्य न पेश करें।
मुकदमों के चक्कर से हटकर आपसी समझौते पर दें जोर: नागरत्ना
जस्टिस नागरत्ना ने कहा कि आज अदालतों में लंबी चलने वाली कानूनी लड़ाइयों की जगह आपसी बातचीत और समझौते (एडीआर – जैसे मीडिएशन और आर्बिट्रेशन) का महत्व बढ़ रहा है। अदालती प्रक्रियाएं बहुत जटिल, महंगी और थकाऊ होती हैं। ऐसे में वकीलों को चाहिए कि वे अपने मुवक्किलों को कोर्ट-कचहरी के चक्कर में उलझाने के बजाय आपसी बातचीत से मामला सुलझाने की सलाह दें।






