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इंदिरा को पत्थर और ट्रंप पर गोली, दौर दो मगर राजनीतिक हिंसा और लीडर्स के अटूट साहस की कहानी एक जैसी

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वॉशिंगटन डीसी के हिल्टन होटल में डिनर के दौरान गोलीबारी हुई. कैलिफोर्निया के एक शिक्षक 31 साल के कोल टॉमस एलन ने हाथ में हथियार लिए लॉबी में घुसने की कोशिश की, गोली चला दी. इस दौरान एक सीक्रेट सर्विस एजेंट घायल हुआ, लेकिन बुलेटप्रूफ जैकेट ने बचा लिया. हमलावर को दबोच लिया गया और राष्ट्रपति ट्रंप, उपराष्ट्रपति जेडी वेंस और अन्य शीर्ष नेता मंच से तुरंत सुरक्षित निकाल लिए गए. ट्रंप ने हमले के बाद ‘फाइट’ का संदेश दिया और कहा- “हम हार नहीं मानेंगे”. यह घटना कुछ-कुछ भारत की एक राजनीतिक हिंसा की घटना से जुड़ती है जो फरवरी 1967 में भूतपूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के साथ घटित हुई थी. बात तत्कालीन ओडिशा राज्य के भुवन
Donald Trump Indira gandhi  – ओडिशा के भुवनेश्वर की वो शाम जब चुनावी सभा की भीड़ में से एक पत्थर उछला, सीधा प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की नाक पर लगा और खून निकल पड़ा, नाक की हड्डी टूट गई, होंठ फट गए… लेकिन इंदिरा गांधी ने मंच नहीं छोड़ा. रुमाल से खून पोंछा और बोलती रहीं. इस घटना के ठीक 59 साल बाद, 25 अप्रैल 2026… वॉशिंगटन डीसी के व्हाइट हाउस कॉरेस्पॉन्डेंट्स डिनर में अचानक गोलियों की तड़तड़ाहट गूंज उठी. राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप मंच पर थे. सीक्रेट सर्विस ने उन्हें तुरंत घेर लिया, मेलेनिया ट्रंप और पूरा कैबिनेट सहित बाहर निकाल आया- लेकिन ट्रंप ने बाद में व्हाइट हाउस से आकर कहा- “हम हार नहीं मानेंगे, हम फिर से खड़े होंगे.” राजनीतिक हिंसा के बीच नेताओं के अटूट साहस का यह जज्बा भारत के संदर्भ में भूतपूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी से जुड़े लगभग छह दशक पूर्व के प्रकरण से जुड़ती है.
वर्ष 1967 की वो भुवनेश्वर रैली…
ओडिशा को तब उड़ीसा कहा जाता था… भुवनेश्वर में सूरज ढल चुका था.  भुवनेश्वर की विशाल मैदान में करीब 50,000 लोग जमा थे. हवा में तनाव था. 1967 के लोकसभा चुनावों का प्रचार चरम पर था. तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी महज एक साल पहले ही पिता जवाहरलाल नेहरू की विरासत संभालकर सत्ता की कुर्सी पर बैठी थीं… देश के कोने-कोने में घूम-घूमकर वोट मांग रही थीं. उस शाम वे भुवनेश्वर पहुंचीं. मंच पर चढ़ते ही भीड़ में कुछ उपद्रवी नजर आने लगे- 20 से 30 साल के युवा चिल्ला-चिल्लाकर हूटिंग कर रहे थे. पत्थर पहले से ही उछल रहे थे, लेकिन इंदिरा गांधी डरी नहीं.
जहां पत्थर ने प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी को लहूलुहान कर दिया…
इंदिरा गांधी ने माइक संभाला और सीधे भीड़ से पूछा, “क्या आप ऐसे गुंडों को वोट देंगे जो दूसरों पर पत्थर फेंकते हैं?” बस यहीं सब बदल गया. एक अंडाकार पत्थर ( कुछ रिपोर्ट्स में ईंट का टुकड़ा) सीधा उनकी नाक पर जा लगा. नाक की हड्डी टूट गई और दांत हिल गए. होठ फट गया, खून निकल आया. इंदिरा जी क्षण भर लड़खड़ाईं, और अगले ही पल अपना चेहरा अपनी ही हाथों से थाम लिया, लेकिन वह मंच से हटीं नहीं. सुरक्षा कर्मी दौड़े. कांग्रेस कार्यकर्ता चीखे-चिल्लाए, “मैडम, नीचे आ जाइए!” लेकिन इंदिरा ने किसी की नहीं सुनी… रुमाल नाक पर दबाया, खून पोंछा और बोलती रहीं. उनकी आवाज में जरा भी कंपकंपी नहीं थी. उन्होंने भीड़ को संबोधित करते हुए कहा, “यह मेरा अपमान नहीं है… बल्कि देश का अपमान है. मैं प्रधानमंत्री के रूप में पूरे देश का प्रतिनिधित्व करती हूं. आपके भविष्य और लोकतंत्र के भविष्य के लिए मैं व्यथित हूं.” भीड़ स्तब्ध थी… उपद्रवी भी चुप हो गए. इंदिरा ने भाषण पूरा किया. तभी सुरक्षा बलों ने उन्हें जबरन मंच से हटाया.
पत्थर से नाक टूटी, फिर भी भाषण नहीं रोका…
डॉक्टरों ने बाद में बताया – नाक की झिल्ली में चोट, ऊपरी होंठ पर गहरी खरोंच, लेकिन उनका हौसला बुलंद था. खून से सनी नाक के साथ अगली रैली… स्टाफ और सुरक्षाकर्मी दिल्ली ले जाने की जिद कर रहे थे. इंदिरा ने साफ मना कर दिया. “अगली सभा कहाँ है?” पूछा, जवाब मिला- कोलकाता. उन्होंने नाक पर पट्टी बंधवाई और सीधे कोलकाता रवाना हो गईं. वहां भी हजारों लोगों के सामने बैंडेज लगाए भाषण दिया. दिल्ली लौटकर डॉक्टरों ने ऑपरेशन किया. बाद में इंदिरा ने मजाक में कहा था, “मुझे लगा था डॉक्टर प्लास्टिक सर्जरी करके मेरी नाक सुंदर बना देंगे. मालूम है न, मेरी नाक कितनी लंबी है? लेकिन अफसोस, मौका हाथ से निकल गया. मैं वैसी की वैसी ही रह गई!”

इंदिरा गांधी ने जिस दृढ़ता से अपने ऊपर हमले के हालात का सामना किया, उसने उनकी छवि को हमेशा के लिए बदल दिया. इतिहास में इंदिरा गांधी आयरन लेडी के तौर पर जानी जाती हैं.

देश ने देखा ‘आयरन लेडी’ का जन्म
उस एक पत्थर ने इंदिरा गांधी की छवि बदल दी. जो लोग उन्हें “कमजोर महिला” और “गूंगी गुड़िया” समझते थे, उन्हें जवाब मिल गया. पूरे देश में चर्चा छा गई. सभी राजनीतिक दल-चाहे विपक्षी हों- ने घटना की निंदा की. जनता में सहानुभूति की लहर दौड़ी. इंदिरा ने चुनाव अभियान नहीं रोका. रायबरेली से भारी मतों से जीतीं. कांग्रेस ने बहुमत बनाया, हालांकि सीटें कम हुईं. यह घटना सिर्फ एक चोट नहीं थी. यह इंदिरा गांधी की राजनीतिक जिंदगी का टर्निंग पॉइंट था. पिता की छाया से निकलकर वे खुद ‘आयरन लेडी’ बन गईं-वो लेडी, जो खुद पर हमले से भी नहीं टूटीं.
59 साल बाद ट्रंप पर गोलीबारी, पर हिम्मत नहीं हारी
अब दो अलग-अलग देश, दो अलग-अलग दौर, लेकिन एक ही कहानी- राजनीति की हिंसा और उसका सामना करने वाले लीडर्स का अटूट साहस. इंदिरा गांधी का पत्थर और ट्रंप की गोलियां हमें याद दिलाते हैं कि लोकतंत्र की लड़ाई कभी आसान नहीं होती. एक महिला प्रधानमंत्री जो नाक से खून बहते हुए भी जनता से जुड़ी रही, और एक अमेरिकी राष्ट्रपति जो गोलीबारी के बाद भी ‘फाइट’ का संदेश दे रहे हैं. यह कहानी सिर्फ एक घटना की नहीं, बल्कि उन नेताओं की है जो मौत के मुंह से लौटकर भी अपनी आवाज बुलंद रखते हैं.साभार न्यूज़ 18