बिलासपुर – छत्तीसगढ़ बिलासपुर हाई कोर्ट ने हत्या के एक मामले में फैसला सुनाते हुए निचली अदालत द्वारा आरोपी को दी गई उम्रकैद की सजा को रद्द कर दिया है। चीफ जस्टिस रमेश सिन्हा और जस्टिस रवींद्र कुमार अग्रवाल की डिवीजन बेंच ने कहा है, मामला पूरी तरह से ‘परिस्थितिजन्य साक्ष्य’ पर आधारित था और पुलिस कड़ियों को जोड़ने में नाकाम रही। कोर्ट ने कहा कि संदेह कितना भी गहरा क्यों न हो, वह कानूनी सबूत का स्थान नहीं ले सकता। अदालत ने आरोपी को संदेह का लाभ देते हुए तत्काल रिहा करने का आदेश दिया है।
मामला उत्तर बस्तर कांकेर जिले का है। 12 जनवरी 2023 को कांकेर पुलिस को ग्राम ठेलकाबोड के पास मौली नगर की एक पहाड़ी पर एक अज्ञात महिला का सड़ा-गला शव मिला था। मृतका की पहचान उसकी बेटी और पति ने हाथ पर गुदे टैटू, कपड़ों और चप्पलों के आधार पर नीरा बाई मांडवी (40 वर्ष) के रूप में की थी। डॉक्टर के मुताबिक महिला की मौत सिर पर किसी भारी और कुंद वस्तु से वार करने के कारण हुई थी। कांकेर सत्र न्यायालय ने 18 मार्च 2024 को इस मामले में आरोपी निरंजन सेठिया (45 वर्ष) को दोषी पाते हुए धारा 302 (हत्या) के तहत उम्रकैद और 500 रुपये जुर्माने की सजा सुनाई थी। इस फैसले को आरोपी ने हाई कोर्ट में चुनौती दी थी।
हाई कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक फैसले का हवाला देते हुए कहा कि परिस्थितिजन्य साक्ष्यों के मामलों में परिस्थितियों की चेन इतनी मजबूत होनी चाहिए जो सिर्फ और सिर्फ आरोपी के दोषी होने की तरफ इशारा करे। डिवीजन बेंच ने अपने फैसले में कहा है,अभियोजन यह साबित करने में सफल रहा है कि नीरा बाई की हत्या हुई थी, लेकिन वह यह साबित करने में पूरी तरह नाकाम रहा कि यह हत्या निरंजन सेठिया ने ही की थी। संदेह कितना भी मजबूत हो, वह पुख्ता कानूनी सबूत की जगह नहीं ले सकता। जब मामले में दो विचार संभव हों, तो लाभ हमेशा आरोपी को मिलना चाहिए। डिवीजन बेंच ने कांकेर सत्र न्यायालय के 2024 के फैसले को पलटते हुए अपील मंजूर कर ली और निरंजन सेठिया को जेल से तुरंत रिहा करने का आदेश जारी किया।






