नई दिल्ली – एक व्यक्ति की हैसियत से अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप किसके साथ लंच करते हैं या किसे अपने परिवार का मेहमान बनाते हैं, यह उनकी व्यक्तिगत स्वतंत्रता है और भारत या दुनिया में किसी को भी इसके कोई फर्क नहीं पड़ता। लेकिन, अमेरिकी जनता ने दूसरी बार उन्हें बड़ी उम्मीदों से दुनिया के सबसे ताकतवर देश की सत्ता में बिठाया है, उन्हें यह कभी नहीं भूलना चाहिए। हो सकता है कि अकूत संपत्ति की वजह से अमेरिका के मौजूदा राष्ट्रपति के निजी जीवन में उच्छृंखलता भरी हुई हो। लेकिन, अमेरिका के राष्ट्रपति होने का मतलब है, वैश्विक मर्यादा से जुड़ा हुआ एक बहुत ही विशाल पद। वह सिर्फ करीब 35 करोड़ अमेरिकियों के ही प्रतिनिधि नहीं हैं,बल्कि दुनिया के सबसे ताकतवर देश के मुखिया होने के नाते उनकी नैतिक जिम्मेदारी का दायरा उससे भी कहीं ज्यादा हो जाता है। लेकिन, अपने दूसरे कार्यकाल में डोनाल्ड ट्रंप अपनी नैतिक मर्यादा को कुछ ज्यादा ही तार-तार करने पर तुले हुए हैं और इस तरह से वह सिर्फ अपनी छवि की मिट्टी ही पलीद नहीं कर रहे हैं, बल्कि वे दुनिया को लोकतांत्रिक मर्यादाओं का पाठ पढ़ाने वाले अमेरिका की मूल आत्मा की हत्या करने पर भी तुले हुए हैं। पाकिस्तानी आर्मी चीफ असीम मुनीर को आधिकारिक मेहमान के तौर पर व्हाइट हाउस में लंच के लिए बुलाना, उनकी कूटनीतिक नासमझी और निर्लज्जता का ऐतिहासिक प्रमाण है।
अमेरिकी लोकतंत्र की मूल भावना पर ट्रंप को चोट
अमेरिकी राष्ट्रपति के आधिकारिक आवास व्हाइट हाउस में असीम मुनीर से पहले भी पाकिस्तानी सेना के तीन जनरलों की मेहमानबाजी की जा चुकी है। अयूब खान, जिया उल हक और परवेज मुशर्रफ की भी तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपतियों के साथ आधिकारिक मुलाकात हो चुकी है। लेकिन, तथ्य यह है कि अपने-अपने समय में ये तब पाकिस्तान के राष्ट्रपति थे। लेकिन, मुनीर तो मात्र पाकिस्तानी सेना के प्रमुख हैं, जिन्हें हाल ही में वहां फील्ड मार्शल का दर्जा दिया गया है। पाकिस्तान में सेना के जनरलों का तख्तापलट के माध्यम से सत्ता हथियाने का पुराना इतिहास रहा है। लेकिन, अभी तो फिर भी वहां किसी रूप में लोकतांत्रिक तरीके से चुनी हुई सरकार मौजूद है। फिर असीम मुनीर को लंच पर बुलाकर ट्रंप ने पाकिस्तानी लोकतंत्र का ही अपमान नहीं किया है, सच्चाई तो यह है कि ऐसा करके उन्होंने अमेरिकी लोकतंत्र के आधार पर ही चोट कर दिया है।
आतंकवादियों के पनाहगाह से आई लव पाकिस्तान तक
जनरल असीम मुनीर कोई आम पाकिस्तानी जनरल नहीं हैं। उनके हाथ 22 अप्रैल, 2025 को जम्मू और कश्मीर के पहलगाम स्थित बैसरन घाटी में 26 बेगुनाहों के खून से रंगे हुए हैं। उनके ही उकसावे पर पाकिस्तानी आतंकवादियों ने वहां पर पर्यटकों को उनसे उनका धर्म पूछ-पूछ कर गोली मारकर हत्या की। लेकिन, आज डोनाल्ड ट्रंप के शब्दों में ‘आई लव पाकिस्तान’ हो चुका है। ज्यादा दिन नहीं बीते हैं, जब ट्रंप इसी पाकिस्तान को ‘आतंकवादियों का सुरक्षित पनाहगाह’बता रहे थे।
क्या ओसामा बिन लादेन का गुनाह माफ कर चुके हैं ट्रंप
दुनिया भले ही भुला दे। लेकिन, क्या अमेरिका इस बात को कभी भुला सकता है कि उसकी धरती पर हुए सबसे बड़े आतंकवादी हमले 9/11 के मास्टरमाइंड अल-कायदा सरगना ओसामा बिन लादेन को पाकिस्तान ने ही वर्षों तक पनाह दे रखा था। अमेरिकी खुफिया एजेंसियां एक दशक तक उसकी तलाश में धरती के कोने-कोने की खाक छानती रही और पाकिस्तानी सेना ने एबटाबाद को उसकी अय्याशी का अड्डा बना रखा था। अगर पाकिस्तान को अमेरिका आज इतना प्यार करने लगा है तो उस वक्त यह प्रेम कहां चला गया था, जब लादेन को मारने के लिए पाकिस्तान में घुसने के दौरान उसने सबसे ज्यादा गोपनीयता पाकिस्तानी फौज से ही बरती थी। तब उसने पाकिस्तान पर ऐसा ही भरोसा क्यों नहीं दिखाया था?






