आखिर क्यों मुख्यमंत्री हार की संभावना का ढोल पीटा जा रहा है..?

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छत्तीसगढ़ में सोमवार को बस्तर संभाग व मुख्यमंत्री का निर्वाचन जिला राजनांदगांव में प्रथम चरण का मतदान पूरा हो गया. इसके दूसरे ही दिन राजनीतिक माहौल गरमाया हुआ है. सोशल मीडिया में कईयों की वैचारिक दीवार (वॉल) चुनावी नतीजों की संभावनाओं और आंकलन से भरी पड़ी है.

इन सबमें दिलचस्प है कि अधिकतर यूज़र (इनमें कई वरिष्ठ पत्रकार, एक्टिविस्ट, अधिवक्ता और भी कई बुद्धिजीवी वर्ग के लोग) ये मान रहे हैं कि मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह उस राजनांदगांव विधानसभा से चुनाव हार रहे हैं जहां से वो पहले दो मर्तबा चुनाव जीत चुके हैं.

सवाल उठना लाजिमी है कि आखिर क्यूं मुख्यमंत्री की हार की संभावना का ढोल पीटा जा रहा है..? कारण कई हो सकते हैं, लेकिन देखने-समझने और पढऩे वाली बात तो वो तथ्य हैं जिनसे आसानी हो.

तथ्यों की ओर बढ़ें तो कुणाल शुक्ला की फेसबुक वॉल पर की गई पोस्ट पर नज़र दौड़ाईए. बात कुणाल शुक्ला की भी कर ली जाए. वे आरटीआई एक्टिविस्ट हैं. इसके अलावा वो स्वयं को भ्रष्टाचार के खिलाफ बताते हुए खुद को आरक्षण विरोधी और स्वयं को वर्तमान व्यवस्था का चिंतक बताते हैं.

बहरहाल कुणाल शुक्ला जो लिखते हैं वो संक्षिप्त में ये है कि भाजपा और मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह ने सबसे बड़ी गलती करुणा शुक्ला को कमतर आंक कर की. इसका नतीजा रहा की भाजपा के प्रचार अभियान में शुरुआती दौर में जोर नज़र नहीं आया.

उनके अनुसार, मतदान के कुछ दिन पहले भाजपा ने जो भी जोर-आजमाईश की वो हवा-हवाई ही रही. स्टार प्रचारकों को भीड़ नहीं दिखी. अमित शाह के रोड शो से बेहतर राहुल गांधी की सभा और रोड शो के नतीजे दिख रहे हैं.

करुणा शुक्ला ने प्रचार में काफी समय दिया और पसीना बहाया. मुख्यमंत्री अपने कार्यक्रमों में व्यस्त रहे. वर्गवार वोटों की बात करते हुए उन्होंने लिखा है कि सिक्ख, मराठा, सिंधी, साहू, ब्राह्मण, मुसलमान, यादव वर्ग के वोटों में इस बार कांग्रेस का दबदबा दिख रहा है. 80 प्रतिशत जैन और मारवाड़ी (जिनकी आबादी पूरी विधानसभा में 2000 के लगभग बताई जाती है) के वोट मुख्यमंत्री के पक्ष में जाते हुए दिखने की बात उन्होंने लिखी है.

बात यह भी दिलचस्प है कि कुणाल लिखते हैं कि, इस बार व्यापारी वर्ग ने भी कांग्रेस को अंदरुनी समर्थन दिया है. दूसरा यह कि कांग्रेस में इस बार एकजुटता दिखी. भीतरघात नहीं रहा. भाजपा के साथ ऐसा नहीं हुआ. वे किसी कद्दावर भाजपा नेत्री का उल्लेख करते हुए लिखते हैं कि उन्होंने भाजपा को काफी नुकसान पहुंचाया है. खासकर राजनांदगांव जिले में.

कुणाल ने मतदान प्रतिशत को भी तरजीह दी है. उनका आंकलन है कि अधिक मतदान प्रतिशत अधिकतर सत्ता विरोधी होता है (ऐसा हो ये जरुरी भी नहीं है).

ये तो हुई सोशल मीडिया की बात. लेकिन कुछ और भी खबरी संचार-माध्यम हैं जो मुख्यमंत्री को करुणा शुक्ला की अपेक्षा कमजोर बता रहे हैं. तथ्य तो ये भी दिए जा रहे हैं कि कहीं हालात दिल्ली जैसे न हों. जहां शीला दीक्षित चौथी बार मुख्यमंत्री नहीं बन पाईं थीं. वहां भी एक नए दल ने खेल खराब किया था.

हालांकि छत्तीसगढ़ में बने नए राजनीतिक दल के आंकड़ों में उतना जोर नहीं है जो दिल्ली में था. लेकिन इससे वो त्रिकोणीय स्थिति बनती दिखती है और सत्ता पक्ष के लिए चिंता बढऩा स्वाभाविक है.